Monday, September 24, 2018

प्रश्‍न - गजानन माधव मुक्तिबोध

एक लड़का भाग रहा है। उसके तन पर केवल एक कुर्ता है और एक धोती मैली-सी! वह गली में भाग रहा है मानो हजारों आदमी उसके पीछे लगे हों भाले ले कर, लाठी ले कर, बरछियाँ ले कर। वह हाँफ रहा है, मानो लड़ते हुए हार रहा हो! वह घर भागना चाहता है, आश्रय के लिए नहीं, छिपने के नहीं; पर उत्‍तर के लिए, एक प्रश्‍न के उत्‍तर के लिए! एक सवाल के जवाब के लिए, एक संतोष के लिए!

गली से दौड़ते-दौड़ते उसका पेट दुखने लगता है, अँतड़ियाँ दुखने लगती हैं, चेहरा लाल-लाल हो जाता है। वह पीछे देखता है, उसका पीछा करनेवाला कोई भी तो नहीं है! गली सुनसान पड़ी है। हलवाई की दुकान पर लाल मक्खियाँ भिनभिना रही हैं, बीड़ी बनानेवाला चुपचाप बीड़ी बनाता चला जा रहा है। और ऐसी दुपहर में यहाँ अँधेरा है। पर ऐसा कौन था जो उसका पीछा कर रहा था? वह देखता है, हजारों प्रश्‍न लाल बर्रों से उसके हृदय के अंधकार मार्ग पर वेग के कारण सूँ-सूँ करते उसका बराबर पीछा कर रहे हैं। उसको पकड़ना चाहते हैं। मार डालना चाहते हैं।

वह दौड़ते-दौड़ते ठहर जाता है और धीरे-धीरे चलने लगता है, और मानो वे हजारों प्रश्‍न अपने करोड़ों ही डंकों को ले कर उसके आस-पास मँडराने लगते हैं। वे उसको व्‍याकुल कर देते हैं और वह नि:सहाय उनमें घिर जाता है, और निकल नहीं पाता।

परंतु फिर भी एक उद्धार का रास्‍ता है, एक स्‍थान है जहाँ वह निश्चित आश्रय पा सकता है। परंतु क्‍या वह मिल सकेगा?

उफ! कितनी घृणा! कितनी शर्म! इससे तो मर जाना ही अच्‍छा, जब कि आधारशिला डूब रही हो। मूल स्रोत ही सूख रहा हो। वह है, तो सब कुछ है, नहीं तो कुछ भी नहीं! कुछ भी नहीं!

'हाय, माँ', वह चिल्‍ला उठता है। परंतु वह अपनी माँ को नहीं पुकारता; वह विश्‍वात्‍मक मातृ शक्ति को पुकारता है कि वह आए और उसको बचाए। वह कर क्‍या सकता है; वह अपने आँचल से उसे न हटाए।

'हाय! परंतु क्‍या मेरा यह भी भाग्‍य है! तो फिर मुझे माता ही क्‍यों दी! वह मर...' और वह अपनी जबान काट लेता है, सोचता है शायद वह गलत हो, जो कुछ सुना है, जो कुछ सुनता आ रहा है वह भी गलत हो। सब गुछ गलत हो सकता है, जैसे सब कुछ सही हो सकता है! भाग्‍य की ही परीक्षा है तो फिर यही सही!

और उस लड़के को याद आ गया कि किस तरह स्‍कूल के लड़के उसे छेड़ते हैं, उसे तंग करते हैं, वह उनसे लड़ता है। मार खा लेता है। उसके मित्र भी उसे बेईमान समझने लगे हैं, क्‍योंकि वह तो ऐसी माता का सुपुत्र है। वे विषपूर्ण ताने कसते हैं। व्‍यंग्‍य भरी मुसकान मुसकराते हैं। क्‍या वे जो कुछ कहते हैं, सच है? क्‍या काका का और मेरी माँ का - छि: छि:, थू: थू:, छि: छि:, थू: थू:!

और वह तेरह बरस का लड़का रास्‍ते चलते-चलते घृणा और लज्‍जा की आग में जल जाता है। काका (जो उसके काका नहीं हैं) और माँ को उसने कई बार पास बैठे हुए देखा है। पर उसे शंका तब नहीं हुई। कैसे होती? पर आज वह उसको उसी तरह घृणा कर रहा है, जैसे जलते शरीर के मांस की दुर्गंध!

परंतु फिर भी उसे विश्‍वास-सा कुछ है। वह सोच रहा है, शायद ऐसा न हो।

और वह लड़का अति व्‍याकुल हो कर अपने पैर बढ़ा लेता है। अँधेरी गलियों में से होता हुआ अपने भाग्‍य की परीक्षा करने के लिए चल पड़ता है।

जब वह घर की देहरी पर थमा तो पाया माँ सो रही है।

एक बोरे पर सुशीला सोई हुई थी। सिर के पास ही लुढ़क कर गिर पड़ी थी, कोई पुस्‍तक! शांत, सुकोमल मुख निद्रा-मग्‍न था। आँखे मुँदी हुई थीं जिन पर कमल वार दिए जा सकते हैं। चेहरे पर कोमलतापूर्ण स्निग्‍ध माधुर्य के शांत-निर्मल सरोवर के अचंचल जलप्रसार-सा पड़ा हुआ झीना नीलम चाँदनी की प्रसन्‍नता के समान दिखलाई देता था। अस्‍तव्‍यस्‍तता के कारण गोरा पतला पेट खुला दिखलाई देता था और वह उसी तरह पवित्र सुंदर मालूम होता था, जैसे दो सघन श्‍यामल बादलों के बीच में प्रकाशमान चंद्र पैर उघाड़े फैले हुए थे मुक्‍त, जैसे जंगल में कभी-कभी बदली के लाल फूल वृक्ष की मर्यादा छोड़ कर टेढ़े-मेढ़े रास्‍ते से होते हुए हरी घास के ऊपर अपने को ऊँचा कर देते हैं, फैला देते हैं। ऐसी यह सुशीला, गरिमा और स्‍त्रीसुलभ कोमलता से पूर्ण सोई हुई थी। उसके भाल पर सौभाग्‍य-कुंकुम नहीं था। उसके स्‍थान पर गोदा हुआ छोटा नीला-सा दाग जरूर दिखलाई देता था, और वह अपने कमनीय तारुण्य में वैधव्‍य लिए हुए उसी तरह दिखलाई देती थी जैसे विस्‍तृत रेगिस्‍तान में फैली हुई, ठिठुरते हुए शीतकाल में पूर्णिमा की चाँदनी।

लड़के ने माँ को देखा कि यह वही पेट है, यह वही गोद है। उसके स्‍नेह-माधुर्य की उष्‍णता कितनी स्‍पृहणीय है!

और वह प्रश्‍न अधिक कटु हो कर, दाहक हो कर, दुर्दम हो कर उसे बाध्‍य करने लगा। वह अपनी प्रेममयी माता से घृणा करे या प्रेम करे! यह प्‍यारी-प्‍यारी गोद, यह गरम-गरम स्‍नेह-भरा पेट जिसमें वह नौ महीने रहा - क्‍या उससे घृणा करनी ही पड़ेगी? पर उफ! यदि उसको संतोष हो जाए कि माँ ऐसी नहीं है, कि वह पवित्र है, यदि वह स्‍वयं इतना कह दे कि कहनेवाले लोग गलत कहते हैं - हाँ वे गलत कहते हैं - तो उसे संतोष हो जाएगा! वह जी जाएगा! उसकी प्‍यारी-प्‍यारी माँ और वह!

एक-दो मिनट वह वैसा ही खड़ा रहा। और फिर वह उसके पास गया और उसके पेट पर सिर रख दिया। न जाने कहाँ से उसकी रुलाई आने लगी और वह रोने लग गया! लोगों के किए हुए अपमान, व्‍यंग्‍य का दु:ख बहने लगा। पर वह तब तक ही था जब तक माँ सो रही थी। वह चाहता था कि वह सोई ही रहे कि तब तक वह उस गोद को अपनी गोद समझ सके, जिस गोद में उसने आश्रय पाया है।

लड़के के गरम आँसुओं के स्‍पर्श से सुशीला जाग उठी। देखा तो नरेंद्र गोद में रो रहा है। उसे आश्‍चर्य हुआ, स्‍नेह भर आया। उसको पुचकारा और पूछा, 'क्‍यों? स्‍कूल से इतनी जल्‍दी कैसे आए, अभी तो ढाई भी नहीं बजा है।'

जैसे ही माँ जगी, नरेंद्र का रोना थम गया। न जाने कहाँ से उसके हृदय में कठोरता उठ आई जैसे पानी में से शिला ऊपर उठ आई हो और भयानक दाहक प्रश्‍नमयी ज्‍वाला उसके मन को जलाने लगी। सुशीला ने नरेंद्र के गालों पर हलकी थप्‍पड़ जमाते हुए कहा, 'बोलो न?'

और नरेंद्र गुम-सुम! उसके गाल न जाने किस शर्म से लाल हो रहे थे, आँखे जल रही थीं।

नरेंद्र माँ की गोद में ही पड़ा था पर उसका उसे अनुभव नहीं हो रहा था।

'माँ,' उसने कठोर, काँपते-सकुचाते हुए पूछा।

सुशीला शंकातुर हो उठी 'क्‍या?'

'सच कहोगी?' उसने दृढ़ स्‍वर में पूछा।

सुशीला ने अधिक उद्विग्‍न हो कर कहा, 'क्‍या है? बोल जल्‍दी।'

नरेंद्र ने धीरे-धीरे गोद में से अपना लाल मुँह निकाला और माँ की ओर देखा। उसका वही, कुछ उद्विग्‍न पर स्मितमय, सुकोमल चेहरा! मानो वह अमृत वर्षा कर रही हो। आशा का ज्‍वार उमड़ने लगा! तो वह मेरी ही माता रहेगी।

उसने फिर कहा, 'सच कहोगी, सचमुच!'

'हाँ रे!'

'माँ, तुम पवित्र हो? तुम पवित्र हो, न?'

सुशीला को कुछ समझ में नहीं आया, बोली, 'मानी?'

नरेंद्र ने विचित्र दृष्टि से देखा। और सुशीला का आकलनशील मुख स्‍तब्‍ध हो गया। निर्विकार हो गया। गट्ठर हो गया। उसकी जाँघ, जिस पर नरेंद्र पड़ा हुआ था, सुन्‍न पड़ गई। उसे मालूम ही नहीं हुआ कि कोई वजनदार वस्‍तु नरेंद्र नाम की उसकी गोद में पड़ी है।

उसने नरेंद्र को एक ओर खिसका दिया और चुपचाप आँखों में हिम्‍मत ले कर उठी, जैसे दीवार पर छाया उठती हुई दीखती है, जिसकी अपनी कोई गति नहीं है। उसके हृदय में एक तूफान, जीवन का एक आवेग उठ खड़ा हुआ। मानो वह वेगवान बवंडर जिसमें धूल, कचरा, कागज, पत्‍ते, कंकर-काँटे सब छूट पड़ते हैं। और वह उसी प्रवाह से शासित हो कर उठ खड़ी हुई और चली गई अंदर, घर के अंदर मानो खूब धूप में पानी के ऊपर से उठता हुआ वाष्‍प-पुंज लहरा कर आसमान में खो जाता है।

नरेंद्र की नैया मानो इस महासागर में डूब गई। उसके जहाज के टुकड़े-टुकड़े हो गए उसी के सामने। वह क्रंदनविह्वल हो कर रोना चाहने लगा खूब ऊँचे स्‍वर से कि आसमान भी फट जाए, धरती भी भग्‍न हो जाए! वह ऊँचे स्‍वर में पुकारने लगा, 'माँ' मानो कोई यात्री टूटे हुए जहाज के एक तख्‍ते से लग कर जो कि उसके हाथ से कभी भी छूट सकता है, घनघोर लहराते हुए समुद्र में अपनी रक्षा के लिए चिल्‍ला उठता है! मरणदेश से वह जीवन के लिए कातर-पुकार!

पर यह सत्‍यानाश उसके हृदय के अंदर ही हुआ और उसका नि:सहाय रोदन स्‍वर भी उसके हृदय में। बाहर से वह फटी हुई आँखों से संसार को देख रहा था। क्‍या यह उसके प्रश्‍न का जवाब था? व‍ह सिपिट गया, ठिठुर गया जैसे संसार में उसे स्‍थान नहीं है। और एक कोने में मुँह ढाँप कर वह सिसकने लगा।

सुशीला अंदर चली गई जहाँ सामान रखा जाता है। वहाँ बैठ गई एक डिब्‍बे पर। कमरे में सब दूर शांत अंधकार था।

अरे, यह लड़का क्‍या पूछ बैठा। कौन-से पुराने घाव की अधूरी चमड़ी उसने खींच ली? वह क्‍या जवाब दे जब कि वह स्‍वयं ही प्रश्‍न लाई है। यही तो है जिसका जवाब वह चाहती है दुनिया से; सबसे?

और सुशीला की आँखों के सामने एक पुरानी तसवीर खिंच आई। तब नरेंद्र का जन्‍म हुआ था एक गाँव में। एक अँधेरा कमरा जिसको सावधानी से बंद कर दिया गया था चारों ओर से ताकि हवा न आ सके। सुशीला खाट पर शिथिल पड़ी थी। तब वह सोलह बरस की थी और पास ही में शिशु नरेंद्र और 'वे' दरवाजे के सामने खड़े थे। हाँ, 'वे' जिनकी घुँघराली मूँछों में मुसकान समा नहीं रही थी। वे प्रसन्‍न थे। वे चालीस वर्ष पार कर रहे थे, तो क्‍या हुआ। वे बड़े प्रेम से सुशीला से बरतते थे। बहुत हृदय से उन्‍होंने सुशीला के स्‍त्रीत्‍व को सँभाला। उस पर अपना आरोप नहीं होने दिया।

एक समय की बात है कि वे बहुत खुश थे। न जाने क्‍यों? वे बिस्‍तर पर लेटे हुए थे। नरेंद्र पास ही खेल रहा था। सुशीला उनके पास बैठी हुई थी। तब एकाएक न जाने किस भावनावश दु:खी होते हुए कहा, 'सुशी, मैंने तुम्‍हें बहुत दु:ख दिया है।' और वे यथार्थ दु:ख से दु:खी मालूम दिए।

'क्‍यों, क्‍या?'

'मैं तुमको सुख नहीं दे सका?'

'ऐसा मत कहो।'

'नहीं सुशीले, मैं अपने को धोखा नहीं दे सकता। मैंने तुम्‍हारे प्रति बहुत बड़ा अपराध किया है।'

'हो क्‍या गया है तुम्‍हें आज - तुम ऐसा मत कहो, नहीं तो मैं रूठ जाऊँगी।' और सुशीला हँस पड़ी। लेकिन 'वे' नहीं हँसे।

वे कहते चले। मुझे तुमसे विवाह नहीं करना था, तुमको एक सलोना युवक चाहिए था, जिसके साथ तुम खेल सकतीं, कूद सकतीं। और वे सुशीला के पास सरक आए, उसकी मोह-भरी गोद में लुढ़क पड़े। अपना मुँह छिपा लिया उसमें। शायद, वे रो रहे थे, न जाने किस रुदन से, सुख के या दु:ख के। पर सुशीला का स्‍नेहमय हाथ उनकी पीठ पर फिर रहा था। इतने प्रौढ़, पर इतने बच्‍चे! इतने गंभीर पर इतने आकुल! और सुशीला के हृदय में वह क्षण एक मधुर सरोवर की भाँति सुखद लहरा रहा था।

आज अपवित्रा सुशीला की आँखों में य‍ह चित्र मेघों की भाँति घुमड़ कर हृदय में श्रावण-वर्षा कर रहा है। इतना विश्‍वस्‍त सुख उसे फिर कब मिला था? जीवन के कुछ क्षण ऐसे ही होते हैं, जो जन्‍म-भर याद रहते हैं। उनके अपने एक विशेष महत्‍वरूपी प्रकाश से वे नित्‍य चमकते रहते हैं।

और न मालूम किस घड़ी 'वे' बीमार पड़ गए। उनकी विशाल शक्तिहीन देह मरणासन्‍न हो गई। वह दृश्‍य सुशीला की आँखों में तैर आया। मरणशैया पर पड़े हुए पति, अँधेरे कमरे में उपचार करनेवाली केवल एक सुशीला और नरेंद्र! फिर वही दृश्‍य, पर कितना बदला हुआ! वही एकांत पर कितना अलग! और पति कह रहे हैं, 'मैंने तुम्‍हारे प्रति अपराध किया है, मैं चला; नरेंद्र को सँभालना।' और नरेंद्र को बुलाते हैं, सुशीला नरेंद्र को पकड़ कर उनके मुँह के सामने रख देती है। वे चूमने की कोशिश करते हैं और उनकी आँखों से आँसू झर पड़ते हैं और फिर वे सुशीला को कहते हैं, 'मैंने तुम्‍हारा अपराध किया है।' और सुशीला रोती हुई 'नहीं-नहीं' कहती है, समझाने की कोशिश करती है और वे कहते हैं, 'नरेंद्र को सँभालना।' इतने में मामा आ जाते हैं। सुशीला हट जाती है।

अंतिम क्षण! पति के अंतिम श्‍वास की घर्राहट! और सुशीला का हृदय भग्‍न, फिर ऊँचा रोदन स्‍वर! मानो अब वह आसमान को फाड़ देगा!

वे कितने अच्‍छे थे! कितने स्‍नेहमय! कितने गंभीर! कितने कोमल!

और अपवित्रा सुशीला फिर से दहाड़ मार कर रो पड़ती है। क्‍या उनको कभी यह मालूम था कि सुशीला को आगे कितना कष्‍ट सहना पड़ेगा।

यदि आज 'वे' होते, चाहे जैसे भी हो, तो क्‍या इतना दु:ख होता। कितनी सुरक्षित होती वह! मजाल होती किसी की कि कोई कुछ कह ले। उन्‍हीं तीस रूपयों में वह अपनी गरीबी का सुख भोगती।

परंतु विधि किसके इच्‍छानुसार चलता है? जब सुख बदा नहीं है, तो कहाँ से मिलेगा!

घर के ठीकरे, कुछ सोना-चाँदी की वस्‍तुएँ बेच-बाच कर... और उसके जीवन में - विधवा के जीवन में अचानक उसका आना - एक का आना!

और रोती हुई सुशीला के सामने एक दृश्‍य आता है! दुपहर! नरेंद्र सात वर्ष का है। वह एक का स्‍वेटर बुन रही है जिसके चार रुपए मिलेंगे। सारा ध्‍यान उसकी एक-एक सीवन में लग रहा है। बाहर दुपहर फैली हुई है, भयानक!

उस समय नरेंद्र आता है, कहता है 'काका' आए हैं। काका पड़ोस में रहते हैं। एक तरुण है, अर्धशिक्षित और वह खेलने चला जाता है।

वे आते हैं अत्‍यंत नम्र, शालीन! क्‍यों? कुछ मालूम नहीं है? शायद वे उसके स्‍वर्गीय पति के कोई लगते हैं!

पर जब वे चले जाते हैं तब उसका हृदय उनकी सहानुभूति से आर्द्र हो जाता है। उनकी मानवतामय उदारता उसके हृदय को छू जाती है। वह उनका आदर करने लगती है। वे उसके पूज्‍य हो उठते हैं।

उनकी स्‍त्री होती है। रूग्‍णा! ईमानदार! और एक बच्‍चा सुधीर।

अब सुशीला उनके यहाँ आने-जाने लगी है। पति को इतनी फुर्सत नहीं होती है कि वह हमेशा बैठा रहे, स्‍त्री के पास। सुशीला उनकी सेवा करती है। नरेंद्र सुधीर के साथ खेलता हैं

ऐसे भी दिन थे। बहुत अच्‍छे दिन थे। निकल गए। निकल जानेवाले थे! और वह समय आया जहाँ जीवन की सड़क बल खा कर घूम गई और वहाँ एक मील का पत्‍थर लग गया कि जीवन अब यहाँ तक आ गया है।

वह मील का पत्‍थर था काका की स्‍त्री का मरना! कई दिनों के बाद जब सुशीला नरेंद्र को ले कर उनके यहाँ गई तो सुधीर उनके पास खड़ा था।

वे रो पड़े। सुशीला चुपचाप बैठी रही। क्‍या कहती वह? वे और सुधीर, सुशीला और नरेंद्र! क्‍या ही अजब जोड़ा था!

सुशीला जब लौटी तो सोच रही थी कि मुझे उनके पड़ोस में ही जा कर रहना चाहिए, जिससे कि उन्‍हें दिलासा हो और उनकी जिंदगी आराम से कटने लगे।

वह कितनी सुखमय पवित्र भूमि थी जिस पर उन दोनों का स्‍नेह आ टिका था। वे दोनों आमने-सामने बैठ जाते - बीच में चाय का ट्रे और दोनों बच्‍चे!

वे कब एक-दूसरे की बाँहों में आ गए, इसका उनको स्‍वयं पता नहीं चला! भले ही वे अलग-अलग रहते हों, पर वे एक-दूसरे के सुख-दु:ख में कितने अधिक साथी थे।

और अपवित्रा सुशीला सोच रही है अपने अँधेरे कमरे में कि उन्‍होंने मेरे जीवन की दोपहर में अपनी सहानुभूति का गीलापन दिया। फिर प्रेम दिया। मैं भीग उठी, उनसे प्रेम किया और न जाने कब तन भी सौंप दिया! उन दोनों का घर एक हो गया।

और एक रात!

दोनों बच्‍चे सो रहे थे। वह उनके लिए जाग रही थी। उसकी आँखे नहीं लगती थीं। वे आ गए अपने सारे तारुण्य में मस्‍त।

और जब वह उनके विह्वल आलिंगन में बिंध गई तो अचानक सुशीला को अपने पतिदेव का खयाल आया। उनका स्‍नेहाकुल मुख कह रहा था, 'तुमको सलोना युवक चाहिए था!'

उस वक्‍त सुशीला ने कहा था, 'नहीं' 'नहीं'।

पर आज वह कह रही थी, 'हाँ' 'हाँ'। और वह अधिक गाढ़ हो कर उन पर छा गई। पति का खयाल उसे फिर भी था।

आज अपवित्रा सुशीला आँखों में आँसू ले कर और हृदय में ज्‍वार ले कर सोच रही है कि उसे अपने जीवन में कहीं भी तो विसं‍गति मालूम नहीं हो रही है। फिर उसके पति को भी विसंगति कैसे मालूम होती। एक सिरा 'पति' है, दूसरा सिरा 'काका'! पर इन दोनों सिरों में खोजते हुए भी विरोध नहीं मिल रहा है। वह उस सिरे से इस सिरे तक दौड़ती है - इस सिरे से उस सिरे तक। पर सब दूर एक स्‍वाभाविक चिकनाहट! फिर वह किस तरह अपवित्र हुई। यह भी कोई समझाए। उसकी शुद्ध सरल आत्‍मा में कैसे अपवित्रता आ लगी?

यह सुशीला का प्रश्‍न है? कोई उत्‍तर दे सकता है? कमरे में वैसे ही अँधेरा है। बाहर नरेंद्र बैठा होता। दुपहर ढल रही है।

सुशीला अंदर उद्विग्‍न है। सोच रही है कि मान लो किसी स्‍त्री का पति इतना उदार न होता, जैसे मेरे थे तो भी क्‍या 'काका' सरीखे पुरुष के साथ वह अपवित्र हो जाती! क्‍या वह सब हृदय का धागा, जिसमें भाग्‍य के रंग बुने हुए हैं, अपवित्र हो गया? तो फिर पवित्र कौन है?

और सुशीला की आँखों के सामने एक चित्र आया! स्‍वर्ग में ईश्‍वर अपने सिंहासन पर बैठा है! न्‍याय हो रहा है! सब लोग चुपचाप खड़े हैं! सुशीला आती है। उसके हाथ-पैर जकड़ दिए गए हैं, उसी के समान दूसरी हजारों स्त्रियाँ आती हैं! ईश्‍वर पूछता है, 'ये कौन हैं?'

हवलदार कहता है, 'अपवित्रा स्त्रियाँ।'

सुशीला पूछ बैठती है, 'तो फिर पवित्र कौन हैं?' ईश्‍वर के एक ओर पवित्र लोग श्‍वेत-वस्‍त्र परिधान किए हुए कुरसियों की कतार पर बैठे हैं।

क्रोधपूर्वक ईश्‍वर उनसे पूछता है, 'क्‍या तुम सचमुच पवित्र हो?' सभी लोग ईश्‍वराज्ञानुसार अपने अंदर देखने लगते हैं; पर वे पवित्र कहाँ थे!

सुशीला चिल्‍ला उठती है उन्‍मादपूर्वक, उनको कुरसियों पर से हटाया जाए।

चित्र चला जाता है। सुशीला को नरेंद्र का खयाल आता है। वह बाहर बैठा होगा! उसको लड़के छेड़ते होंगे। बात तो कब की फैल गई है। उफ, उसका भविष्‍य! नहीं मुझे उसी के भविष्‍य की चिंता है!

और सुशीला के हृदय में कटुता, चिंता, विषाद भर आता है।

हम दोनों साथ-साथ, पास-पास बैठते हैं, पर अब तक तो उसने कभी भी ऐसा नहीं किया। उसने तो उसे स्‍वाभाविक मान लिया। उसकी सारी सहज पवित्रता की सरलता को उसने स्‍वीकार कर लिया।

फिर यह कैसा प्रश्‍न? कैसी महती विडंबना है! और मेरे प्रश्‍न का उत्‍तर कौन दे सकता है। है हिम्‍मत किसी में...?

इतने में नरेंद्र के साथ बहुत कुछ हो गया। काका चले आए। वे पढ़ते हुए बैठे रहे। नरेंद्र घृणा से जल रहा था। वे कुछ पूछते तो उन्‍हें वह काट खाता। यही तो है वह पुरुष जिसने उससे, उसकी माता को छीन लिया।

भाग्‍य था कि काका वहाँ से चले गए। नरेंद्र सोच रहा था कि वह उन्‍हें मार डालेगा। पर वह चले गए तो आत्‍महत्‍या करने की सोचने लगा। वह फौरन जा कर अपनी जान दे देगा। उफ, तीन घंटे कितने घोर हैं।

माँ न जाने किस दु:ख से शिथिल-सी चली आई। उसका चेहरा तप्‍त था, हृदय जल रहा था। पर उसमें आँसुओं की बाढ़ आ रही थी।

नरेंद्र मुँह ढाँपे बैठा हुआ था।

सुशीला उसके पास चली गई। एकदम उसको अपनी गोद में ले लिया। उसकी आँखों से जल-धारा बरसने लगी और वह जोर-जोर से चुंबन लेने लगी। नरेंद्र ने देखा जैसे उसकी माँ उसे फिर मिल गई हो; पर वह खोई ही कहाँ थी? फिर भी वह कुंठित था, अकड़ा ही रहा।

सुशीला अतिलीन हो बोली, 'तुम मुझे क्‍या समझते हो नरेंद्र?'

नरेंद्र सोचता रहा। उसकी जबान पर आ गया, पवित्र; पर कहा नहीं; उसकी गोद में चिपक गया और उसके आँसू सहस्‍त्र धारा में प्रवाहित होने लगे। युग-युग का दु:ख बहने लगा। तब वे सच्‍चे माँ-बेटे थे।

सुशीला ने डरते-डरते पूछा, 'तुम उनको, 'काका' को गैर समझते हो? साफ कहो!'

नरेंद्र ने सोचा; कहा, 'नहीं।'

सुशीला ने पूछा, 'नहीं न!' और उसका मुँह नरेंद्र के मन में समाया हुआ था।

सुशीला ने रोते हुए कहा, 'तुम कभी उनको तकलीफ मत देना... अँ।'

नरेंद्र ने कहा, 'नहीं, माँ।'

सुशीला स्थिर हो गई। जाने किस हवा से मेघ आकाश से भाग गए।

वह तीव्र हो बोली, 'तो मैं अपवित्र कैसे हुई!' नरेंद्र के सामने वे सब लड़के, दूसरे लोग आने लगे, जो उसे इस तरह छेड़ते हैं। उसने त्रस्‍त हो कर कहा, 'लोग कहते हैं।'

सुशीला और भी तीव्र हो गई। बोली, 'तो तुम उनसे जा कर क्‍यों नहीं कहते, बुलंद आवाज में कि मेरी माँ ऐसी नहीं है।'

नरेंद्र ने कहा, 'वे मुझे छेड़ते हैं, मुझे तंग करते हैं, मैं स्‍कूल नहीं जाऊँगा।'

'तुम बुजदिल हो।'

और यह शब्‍द नरेंद्र के हृदय में तीक्ष्‍ण पत्‍थर के समान जा लगा। वह बच्‍चा तो था लेकिन तिलमिला उठा। उसे भूला नहीं। अमूल्‍य निधि की भाँति उस घाव के सत्‍य को उसने छिपा रखा।

और मैं एक दिन पाता हूँ कि नरेंद्र कुमार एक कलाकार हो गया है। मैं एक गाँव में मास्‍टरी करता हूँ पंद्रह रुपए की, सुशीला मर गई है। पर मैं यहीं दुनिया के आसमान में एक कृपाण की भाँति तेजस्‍वी उल्‍का का प्रकाश छाया हुआ देख रहा हूँ, जिसकी पूजा सब लोग कर रहे हैं। मुझे बाद में मालूम हुआ कि यह नरेंद्र कुमार का प्रकाश है। सुशीला की जन्‍मभूमि, हमारा गाँव, धन्‍य है!

अँधेरे में - गजानन माधव मुक्तिबोध

एक रात को बारह बजे, ट्रेन से एक युवक उतरा। स्टेशन पर लोग एक कतार में खड़े थे और ज्‍यादा नहीं थे। इसलिए ट्रेन से नीचे आने में उसको ज्‍यादा कठिनाई नहीं हुई। स्‍टेशन पर बिजली की रोशनी थी; परंतु वह रात के अँधियारे को चीर न सकती थी, और इसलिए मानो रात अपने सघन रेशमी अँधियारे से तंबूनुमा घर हो गई थी, जिसमें बिजली के दीये जलते हों। उतरते ही युवक को प्‍लेटफॉर्म की परिचित गंध ने, जिसमें गरम धुआँ और ठंडी हवा के झोंके, गरम चाय की बास और पोर्टरों के काले लोहे में बंद मोटे काँचों से सुरक्षित पीली ज्‍वालाओं के कंदीले पर से आती हुई अजीब उग्र बास, इत्‍यादि सारी परिचित ध्‍वनियाँ और गंध थे, उसकी संज्ञा से भेंट की। युवक के हृदय में जैसे एक दरवाजा खुल गया था, एक ध्‍वनि के साथ और मानो वह ध्‍वनि कह रही थी - आ गया, अपना आ गया

युवक झटपट उतरा। उ‍सके पास कुछ भी सामान नहीं था, कोयले के कणों से भरे हुए लंबे बालों में हाथों से कंघी करता हुआ वह चला। पाँच साल पहले वह यहीं रहता था। इन पाँच सालों की अवधि में दुनिया में काफी परिवर्तन हो गया; परंतु उस स्‍टेशन पर परिवर्तन आना पसंद नहीं करता था। युवक ने अपने पूर्वप्रिय नगर की खुशी में एक कप चाय पीना स्‍वीकार किया। और वहीं स्‍टॉल पर खडा हो कर कपबशी की आवाज सुनता हुआ इधर-उधर देखने लगा। सब पुराना वातावरण था। परंतु इस नगर के मुहल्‍ले में बीस साल बिता चुकने वाला यह पच्‍चीस साल का युवक पुराना नहीं रह गया था। उसकी आत्‍मा एक नए महीन चश्‍मे से स्‍टेशन को देख रही थी।

टिकिट दे कर स्‍टेशन पर आगे बढ़ा तो देखता है कि ताँगे निर्जल अलसाए बादलों कि भाँति निष्‍प्रभ और स्‍फूर्तिहीन ऊँघते हुए चले जा रहे हैं। युवक ने इसी से पहचान लिया कि यह विशेषता इस नगर की अपनी चीज है।

दुकानें सब बंद हो चुकी थीं, जिनके पास नीचे सड़क पर आदमी सिलसिलेवार सो रहे थे। उनके साथी और उन्‍हीं के समान सभ्‍य पशुओं में से निर्वासित श्‍वान-जाति दुबकी इधर-उधर पड़ी हुई थी। युवक ने पैर बढ़ाने शुरू कर दिए। उखड़ी हुई डामर की काली सड़क पर बिजली की धुँधली रोशनी बिखर रही थी। एक ओर दुकानें, फिर सराय, फिर अफीम-गोदाम, फिर एक टुटपुँजिया म्‍यूनिसिपल पार्क, फिर एक छोटा चौराहा जहाँ डनलप टॉयर के विज्ञापनवाली दुकान और उसके सामने लाल पंप, फिर उसके बाद कॉलेज! और इस तरह इस छोटे शहर की बौनी इमारतें और नकली आधुनिकता इसी सड़क के किनारे-किनारे एक ओर चली गई थी। दूसरी ओर रेल का हिस्‍सा, जहाँ शंटिंग का सिलसिला इस समय कुछेक घंटों के लिए चुप था।

युव‍क को रात का यह वातावरण अत्यंत प्रिय मालूम हुआ। गरमी के दिन थे। फिर भी हवा बहुत ठंडी चल रही थी। सड़क के खुले हिस्‍से मे जहाँ रेल के तार जा रहे थे, नीम और पीपल के वृक्ष के पत्‍ते झिरमिर-झिरमिर कर सघन आम के बड़े-बड़े दरख्त दूर से ही दीख रहे थे। उसी मैदान पर, एक ओर, एक नवीन मुहल्‍ला, शहर के अमीरों, व्‍यापारियों, अफसरों का उपनिवेश सिकुड़ा हुआ था।

सब दूर शांति थी। रात का गाढ़ा मौन था। युवक के रोजमर्रा के कर्मप्रधान जीवन में रोज रात का एक सोने का समय था, और सुबह के साढ़े आठ के अनंतर जागने का समय था। वैदिक ॠषि-मनीषियों के उष:सूक्‍त से लगा कर तो अत्‍याधुनिक छायावादियों के 'बीती विभावरी जाग री, अंबर पनघट ऊषा नागरी' का दर्शन इस युवक ने इस गए पाँच सालों में बहुत कम किया है।

अपने उस कर्म-जटिल क्षेत्र को पीछे छोड़ कर जैसे मनुष्‍य अपनी अरुचिकर यादों से बचना चाहता हो - यह युवक इस रात में पा रहा था कि वातावरण में पठार-मैदान से उठ कर आने वाली हवा की उत्‍फुल्‍ल और मीठी ताजगी के साथ-ही-साथ मानो मनुष्‍यों की सोई हुई चुपचाप आत्‍माएँ अपनी गाढ़ नीरवता में अधिक मधुर हो कर वन की सुगंध और वृक्ष के मर्मर में मिल गई हैं।

रेल की पटरियों के पार - रेलवे यार्ड में ही वहाँ के मध्‍यमवर्गीय नौकरों के क्‍वार्टर्स बने हुए थे। बाहर ही, जो उसका आँगन कहा जा सकता है; दो खाटें समानांतर बिछी हुई थीं जिनके बीच में एक छोटा-सा टेबल रखा हुआ था। उस पर एक आधुनिक लैंप अपनी अध्‍ययन समर्पित रोशनी डाल रहा था। एक खाट पर एक पुरुष कोई पुस्‍तक पढ़ रहा था और दूसरी पर घोर निद्रा थी। लैंप की धुँधली रोशनी में घर के सामनेवाले बाजू पर एक काला-सा अधखुला दरवाजा ओर बाँस की चिमटियों से बनाए गए बंद बरामदे के लेटे-से चतुष्‍कोण साफ दीख रहे थे। उस घर की पंक्ति में ही कई क्‍वार्टर्स और दीख रहे थे, उसी तरह पंक्तिबद्ध खाटें बराबर यथास्‍थान लगी हुई चली गई थीं।

युवक के मन में एक प्‍यार उमड़ आया! ये घर उसे अत्यंत आत्‍मीय-जैसे लगे, मानो वे उसके अभिन्‍न अंग हों!

यही बात उसकी समझ में नहीं आई। इस अजीब आनंदमय भावना ने उसके मन के संतुलित तराजू को झटके देने शुरू कर दिए। वह भावनाओं से अब इतना अभ्‍यस्‍त नहीं रह गया था कि उनका आदर्शीकरण कर सके। रोज का कठिन, शुष्‍क, जीवन उसे एक विशेष तरह का आत्‍मविश्‍वास-सा देता था। परंतु... आज...

वह बैठने वाला जीव न था। रास्‍ते पर पैर चल रहे थे। मन कहीं घूम रहा था। दूसरे उसे अत्यंत आत्‍मीय एकांत, जहाँ उसकी सहज प्रवृत्तियों का खुला बालिश खिलवाड़ हो बहुत दिनों से नहीं मिला था!

उसने सोचना शुरू किया कि आखिर क्‍यों यह अजीब जल के निर्मलिन सहस्‍त्र स्रोतों-सी भावना उसके मन में आ गई!

उसको जहाँ जाना था, वहाँ का रास्‍ता उसे मिल नहीं सकता था। एक तो यह कि पाँच साल के बाद शहर की गलियों को वह भूल चुका था। दूसरे जिस स्‍थान पर उसे जाना था, वह किसी खास ढंग से उसे अरुचिकर मालूम हो रहा था! इसलिए लक्ष्‍यस्‍थान की बात ही उसके दिमाग से गायब हो गई थी।

पैर चल रहे थे या उसके पैर के नीचे से रास्‍ता खिसक रहा था, यह क‍हना संभव नहीं, परंतु यह जरूर है कि कुछ कुत्‍ते-चिर जाग्रत रक्षक की भाँति खड़े हुए - भूँक रहे थे।

उसके मन में किसी अजान स्‍त्रोत से एक घर का नक्‍शा आया। उसका भी बरामदा इसी तरह बाँस की चिमटियों से बना हुआ था। वहाँ भी वासंती रातों में नीम के झिरिर-मिरिर के नीचे खाटें पड़ी रहती थीं। युवक को एक धुँधली सूरत याद आती है, उसकी बहन की-और आते ही फौरन चली जाती है। बस चित्र इतना ही। यह मत समझिए कि उसके माता-पिता मर गए! उसके भाई हैं, माता-पिता हैं। वे सब वहीं रहते हैं जिस शहर में वह रहता है।

युव‍क हँस पड़ा। उसे समझ में आ गया कि क्‍यों उन क्‍वार्टरों को देख कर एक आत्‍मीयता उमड़ आई। मजदूर चालों में, जहाँ वह नित्‍य जाता है, या उसके अमीर दोस्‍तों के स्‍वच्‍छ सुंदर मकानों में, जहाँ से वह चंदा इ‍कट्ठा करता, चाय पीता, वाद-विवाद करता और मन-ही-मन अपने महत्‍व को अनुभव करता है - वहाँ से तो कोई आत्‍मीयता की फसफसाहट नहीं हुई। हमारा युवक अपने पर ही हँसने लगा। एक सूक्ष्‍म, मीठा और कटु हास्‍य।

दूर, एक दुकान पर साठ नंबर का खास बेलजियम का बिजली का लट्टू जल रहा था। सड़क पर ही कुरसियाँ पड़ी थीं, बीच मे टेबल था। एक आरामकुरसी पर लाल भैरोगढ़ी तहमत बाँधे हुए ताँगेवाले साहब बैठे हुए बिस्‍कुट खा रहे थे। दूसरी कुरसी पर एक निहायत गंदा, पीछे से फटी हुई चड्ढी पहने, उघाड़े बदन, लडका कभी बिस्‍कुटों के चूरे खाने की तरफ या भाप उठाते हुए टेबल पर रखे चाय के कप‍ की तरफ देखता हुआ बैठा था! दूसरी कुरसी पर दूसरे मुसलमान सज्‍जन रोटी और मांस की कोई पतली वस्‍तु खा रहे थे और बहुत प्रसन्‍न मालूम हो रहे थे। जो होटल का मालिक था वह एक पैर पर अधिक दबाव डाले - उसको खूँटा किए खड़ा था, सिगरेट पी रहा था और कुछ खास बुद्धिमानी की बातें करता था जिसको सुन कर रोटी और मांस की पतली वस्‍तु को दोनों हाथों का उपयोग कर खाने वाले मुसलमान सज्‍जन 'अल्‍लाहो अकबर' 'अल्‍ला रहम करे, इत्‍यादि भावनाप्‍लुत उद्गारों से उसका समर्थन करते जाते थे। सिगरेट का कश वह इतनी जोर से खींचता था कि उसका ज्‍वलंत भाग बिजली की भयानक रोशनी में भी चमक रहा था। उसका हाथ आराम से जंघा-क्षेत्र में भ्रमण कर रहा था।

दुकान के अंदर से पानी को झाड़ू से फेंकने की क्रिया में झाड़ू की कर्कश दाँत पीसती-सी आवाज और पानी के ढकेले जाने के बालिश ध्‍वनि आ रही थी, साथ ही उसके छोटे-छोटे कंकड़ों की भाँति लगातार बाहर उन्‍नत-वक्र रेखा-मार्ग से चले आ रहे थे। बिजली का लट्टू दरवाजे के ऊपर लगे हुए कवर के बहुत नीचे लटक रहा, था जिस पर लगातार गिरने वाले छींटे सूख कर धब्‍बे बन रहे थे।

इतने में पुलिस के एक गश्‍तवान सिपाही लाल पगड़ी पहने और खाकी पोशाक में आ कर बैठ गए! वे भी मुसलमान ही थे। उनकी दाढ़ी पर छह बाल थे, और ओठों पर तो थे ही नहीं। चालीस साल की उम्र हो चुकी थी पर बालों ने उन पर कृपा नहीं की थी। नाक उनकी बुद्धि से व्‍यापक थी, काले डोरे की गुंडी की भाँति चम‍क रही थी। आँख में एक चुपचाप दय‍नीयता झाँक उठती। वह कोई मुसीबतजदा प्राणी था - शायद उसे सूजाक था - या उसकी घरवाली दूसरे के साथ फरार हो गई थी! या वह किसी अभागी बदसूरत-वेश्‍या का शरीर-जात था। उसे न जाने कौन-सी पीड़ा थी जो चार आदमियों में प्रकट नहीं की जा स‍कती थी। वह पीड़ा-थीड़ा तो दूसरों के आनंद और निर्बाध हास्‍य को देख कर चुपचाप निबिड़ आँखों में चमक उठती थी! वह इस समय भी चमक रहीं थी, किसी ने उसकी तरफ ध्‍यान नहीं दिया। उसके सामने क्रमानुसार चाय आ गई और वह फुर-फुर करते हुए पीने लगा।

ताँगेवाले महाशय का ताँगा वहीं दुकान के सामने सड़क के दूसरे किनारे खड़ा था। घोड़ा अपने मालिक की भाँति बड़ा चढ़ैल और गुस्‍सैल था। एक ओर तो वह बिजली की रोशनी में चमकनेवाली हरी घास को बादशाह की भाँति खा रहा था, तो दूसरी ओर आध घंटे में एक बार अपनी टाँग ताँगे में मार देता था। उसके घास खाने की आवाज लगातार आ रही थी और उसका भव्‍य सफेद गंभीर चेहरा होटल को अपेक्षा की दृष्टि से देख रहा था।

ताँगेवाले महाशय ने चाय पीनी शुरू की। तगड़ा मुँह था। बेलौस सीधी नाक थी और उजला रंग था। ठाठदार मोतिया साफा अब भी बँधा हुआ था। बोलो-चाल निहायत शुस्‍ता और सलीके से भरी थी। चेहरा पर मार्दव था जो कि किसी अक्‍खड़ बहादुर सिपाही में ही स‍‍कता है। आज दिन में उन्‍होंने काफी कमाई की थी; इसीलिए रात में जगने का उत्‍साह बहुत अधिक मालूम हो रहा था।

दुकान के अंदर झाड़ू की कर्कश आवाज और पानी की खलखल ध्‍वनि बंद हो गई। छोटी-छोटी बूँदें टपकानेवाली मैली झाड़ू लिए एक पंद्रह साल का लड़का, एक घुटने पर से फटे पाजामे को कमर पर इकट्ठा किए खड़ा था कि मालिक का अब आगे क्‍या हुक्‍म होता है। परंतु बाहर मजलिस जमी थी। लाल साफेवाला सिपाही बड़ी रुचि के साथ उसे सुन रहा था। चाहता था कि वह भी कुछ कहे...।

इतने में इन लोगों को दूर से एक छाया आती हुई दिखाई दी। सब लोगों ने सोचा कि इस बात पर ध्‍यान देने की जरूरत नहीं! पर धीरे-धीरे आनेवाली उस छाया का सिर्फ पैंट ही दिखाई दिया और कुछ थकी-सी चाल! युवक चुपचाप उन्‍हीं की ओर आया और हलकी-सी आवाज में बोला 'चाय है?' उत्‍तर में 'हाँ' पा कर और बैठने के लिए एक अच्‍छी आरामदेह कुरसी पा कर वह खुश मालूम हुआ। लोगों ने जब देखा कि चेहरे से कोई खास आ‍कर्षक या आसाधारण आदमी मालूम नहीं होता, तब आश्‍वस्‍त हो, साँस ले कर बातें करने लगे!

लाल पगड़ीवाला दयनीय प्राणी कुछ बोलना चाहता था! इतने मे उसके दो साथी दूर से दिखाई दिए! उन्‍‍हें देख कर वह अत्यंत अनिच्‍छा से वहाँ से उठने लगा। उसने सोचा था कि शायद है कोई, बैठने को कहे। परंतु लोगों को मालूम भी नहीं हुआ कि कोई आया था और जा रहा है!

'माधव महारज के जमाने में ताँगेवालों को ये आफत नहीं थी मौलवी सॉब! मैंने बहुत जमाना देखा है! कई सुपरडंट आए, चले गए, कोतवाल आए, निकल गए। पर अब पुलिसवाला ताँगे में मुफ्त बैठेगा भी, और नंबर भी नोट करेगा...' ताँगेवाले ने कहा।

होटलवाला जो अब तक मौलवी साहब से कुछ खास बुद्धिमानी की बात कर रहा था, उसने अब जोर से बोलना शुरू किया! धोती की तहमत बाँधे, बहुत दुबला, नाटे कद का एक अधेड़ हँसमुख आदमी था। वह बहुत बातूनी, और बहुत खुशमिजाज आदमी और अश्‍लील बातों से घृणा करनेवाला, एक खास ढंग से संस्‍कारशील और मेहनती मालूम होता था। उसने कहा, 'मौलवी सॉब, दुनिया यों ही चलती रहेगी। मैंने कई कारोबार किए। देखा, सबमें मक्‍कारी है। और कारोबारी की निगाह में मक्‍कारी का नाम दुनियादारी है। पुलिसवाले भी मक्‍कार हैं - ताँगेवाले कम मक्‍कार नहीं हैं। वह जैनुल आबेदीन-मिर्जावाड़ी में रहने वाला... सुना है आपने किस्‍सा!'

मौलवी साहब ठहाका मार कर हँस पड़े। 'या अल्‍लाह' कहते हुए दाढ़ी पर दो बार हाथ फेरा और अपनी उकताहट को छिपाते हुए - मौलवी साहब को एक कप चाय और बिस्‍कुट मुफ्त या उधार लेना था - आँखों में मनोरंजन विस्‍मय - कुढ़ कर होटलवाले की बात सुनने लगे।

होटलवाले ने अपने जीवन का रहस्‍योद्घाटन करने से डर कर बात को बदलते हुए कहा, 'मैं आपको किस्‍सा सुनाता हूँ। दुनिया में बदमाशी है, बदतमीजी है। है, पर करना क्‍या? गालियों से तो काम नहीं चलता, क्‍यों रहीमबक्‍श (ताँगेवाले की ओर संकेत कर) ताँगेवाले बहुत गालियाँ देते हैं! दूसरे, सड़क पर से गुजरती हुई औरतों को देख - चाहे वे मारवाड़िनियाँ ही हों ढिल्‍लमढाल पेटवाली, बस इन्‍हें फौरन लैला याद आ जाती है! यह देख कर मेरी रूह काँपती है। मौलवी सॉब, मेरा दिल एक सच्‍चे सैयद का दिल है! एक दफा क्‍या हुआ कि हजरत अली अपने महल में बैठे हुए थे। और राज-काज देख रहे थे कि इतने में दरबान ने कहा कि कुछ मिस्‍त्री सौदागर आए हैं, आपसे मिलना चाहते हैं। अब उनमें का एक सौदागर आलिम था।'

मौलवी सिर्फ उसके चेहरे को देख रहे थे जिस पर अनेक भावनाएँ उमड़ रहीं थीं, जिससे उसका चिपका - काला चे‍हरा और भी विकृत मालूम होता था। दूसरे वह यह अनुभव कर रहे थे कि यह अपना ज्ञान बघार रहा है और ज्ञान का अधिकार तो उन्‍हें है। तीसरे, उन्‍होंने यह योग्‍य समय जान कर कहा, 'भाई, एक कप चाय और बुलवा दो।'

चाय का नाम सुन कर कुरसी पर बैठे हुए युवक ने कहा, 'एक कप यहाँ भी।'

पीछे से फटी चड्ढी पहने हुए गंदा लड़का ऊँघ रहा था! वह ऊँघता हुआ ही चाय लाने लगा। ताँगेवाला रहीमबख्‍श बातों को गौर से सुन रहा था। वह जानना चाहता था कि इस कहानी का ताँगेवालों से क्‍या संबंध है!

होटलवाले ने कहना शुरू किया, उनमें का एक सौदागर आलिम था। उसने हजरत अली का नाम सुन रखा था कि गरीबों के ये सबसे बड़े हिमायती हैं। शानो-शौकत बिलकुल पसंद नहीं करते। और अब देखता क्‍या है कि महल की दीवारें संगमरमर से बनी हुई हैं, जिसमें ख्‍वाब-कोहके हीरे दरवाजों के मेहराबों पर जड़े हुए हैं और चबूतरा काले चिकने संगमूसे का बना हुआ है। हरे-हरे बाग हैं और फव्‍वारे छूट रहे हैं। वह मन-ही-मन मुसकराया। गरमी पड़ रही थी, और रूमाल से बँधे हुए सिर से पसीना छूट रहा था।

हजरत अली के सामने जब माल की कीमत नक्‍की हो चुकी, तो सौदागर उनकी मेहरबान सूरत से खिंच कर बोला, 'बादशाह सलामत! सुना था कि हजरत अली गरीबों के गुलाम हैं। पर मैंने कुछ और ही देखा है। हो सकता है, गलत देखा हो।'

सौदागर अपना गट्ठा बाँधते-बाँधते कह रहे थे। हजरत अली की आँख से एक बिलजी-सी निकली। सौदागर ने देखा नहीं, उसकी पीठ उधर थी, वह अपने माल का गट्ठा बाँध रहा था!

हजरत अली ने कहा, 'ज्‍यादा बातें मैं आपसे नहीं कहना चाहता। आप मुझे इस वक्‍त महल में देखते हैं, पर हमेशा यहाँ नहीं रहता। बाजार में अनाज के बोरे उठाते हुए मुझे किसी ने नहीं देखा है।' हजरत अली की आँखें किसी खास बेचैनी से चमक रही थीं!

वे रेशम का लंबा शाही लबादा पहने हुए थे। उन्‍होंने उसके बंद खोले। सौदागर ने आश्‍चर्य से देखा कि हजरत अली मोटे बोरे के कपड़े अंदर से पहने हुए हैं।

सौदागर ने सिर नीचा कर लिया।

सैयद होटलवाले की आँखों में आँसू आ गए। मौलवी साहब ने सिर नीचा कर लिया, मानो उन्‍हें सौ जूते पड़ गए हों। चाय की गरमी सब खतम हो गई। ताँगेवाले को इसमें खास मजा नहीं आया। युवक अपनी कुरसी पर बैठा हुआ ध्‍यान से सुन रहा था।

होटलवाले ने कहा, 'असली मजहब इसे कहते हैं। मेरे पास मुस्लिम लीगी आते हैं! चंदा माँगते हैं। मुस्लिम कौम निहायत गरीब है! मुझसे पाकिस्‍तान नहीं माँगते। मुझसे पाकिस्‍तान की बातें भी नहीं करते। हिंदू-मुस्लिम इत्‍तेहाद पर मेरा विश्वास है। लेकिन मैं जरूर दे देता हूँ। 'कौमी-जंग' अखबार देखा है आपने? उसकी पॉलिसी मुझे पसंद है। लाल बावटे वालों का है। मैं उन्‍हें भी चंद देता हूँ। मेरा ममेरा भाई 'बिरला मिल' में है। खाता कमेटी का सेक्रेटरी है। वह मुझसे चंदा ले जाता है।'

युवक अब वहाँ बैठना नहीं चाहता था। फिर भी, सैयद साहब की बातों को पूरा सुन लेने की इच्‍छा थी। मालूम होता था, आज वे मजे में आ रहे हैं।

रात काफी आगे बढ़ चुकी थी। होटल के सामने म्‍युनिसिपल बगीचे के बड़े-बड़े दरख्‍त रात की गहराई में ऊँघ-से रहे थे, जिनके पीछे आधा चाँद, मुस्लिम नववधू के भाल पर लटकते हुए अलंकार के समान लग रहा था।

नवयुवक जब और चलने लगा तो मालूम हुआ कि उसके पीछे भी कोई चल रहा है। उन दोनों के पैरों की आवाज गूँज रही थी। परंतु चाँद की तरफ (जिसकी काली पृष्‍ठभूमि भी कुछ आरुण्‍य लिए थी, मानो किसी मुग्‍ध रुचिर चेहरे पर खिली हुई लाल मिठास हो), जो घने दरख्‍तों के पीछे से उठ रहा था, वह युवक मुँह उठाए देखता जा रहा था। विशाल, गहरा काला, शुक्रतारकालोकित आकाश और नीचे निस्‍तब्‍ध शांति जो दरख्‍तों की पत्तियों में भटकने वाले पवन की क्रीड़ा में गा उठती थी।

युवक ऐसी लंबी एकांत रात में अर्ध-अपरिचित नगर की राह में अनुभव कर रहा था कि मानो नग्‍न आसमान, मुक्‍त दिशा और (एकाकी स्‍वपथचारी सौंदर्य के उत्‍सा-सा, व्‍यक्तिनिरपेक्ष मस्‍त आत्‍मधारा के खुमार-सा) नित्‍य नवीन चाँद से लाखों शक्ति-धाराएँ फूट कर नवयुवक के हृदय में मिल रही हों। नग्‍न, ठंडे पाषाण-आसमान और चाँद की भाँति ही - उसी प्रकार, उसका हृदय नग्‍न और शुभ्र शीतल हो गया है। द्रव्‍य की गतिमयी धारा ही उसके हृदय में बह रही है। पाषाण जिस प्रकार प्रकृति का अविभाज्‍य अंग है, मनुष्‍य प्रकृति पर अधिकार करके भी अपने रूप से उसका अविभाज्‍य अंग है।

चाँद धीरे-धीरे आसमान में ऊपर सरक रहा था। वृक्षों का मर्मर रात के सुनसान अँधेरे में स्‍वप्‍न की भाँति चल रहा था, परस्‍पर-विरोधी विचित्रगति ताल के संयोग-सा।

जो छाया दो कदम पीछे चल रही थी, वह नवयुवक के साथ हो गई। नवयुवक ने देखा कि सफेद, नाजुक, लाठी के हिलते त्रिकोण पर चाँद की चाँदनी खेल रही है; लंबी और सुरेख नाक की नाजुक कगार पर चाँद का टुकड़ा चमक रहा है, जिससे मुँह का करीब-करीब आधा भाग छायाच्‍छन्‍न है। और दो गहरी छोटी आँखें चाँदनी और हर्ष से प्रतिबिंबित हैं। उस वृद्ध मौलबी के चेहरे को देख कर नवयुवक को डी.एच. लॉरेन्‍स का चित्र याद आ गया! उस अर्द्ध-वृद्ध ने आते ही अपनी ठेठ प्रकृति से उत्‍सुक हो कर पूछा, 'आप कहाँ रहते है?'

वृद्ध के चेहरे पर स्‍वाभाविक अच्‍छाई हँस रही थी। इस नए शहर के (यद्यपि नवयुवक पाँच साल पहले यहीं रहता था) अजनबीपन में उसे इस मौलवी का स्‍वाभाविक अच्‍छाई से हँसता चेहरा प्रिय मालूम हुआ। उसने कहा, 'मैं इस शहर से भलीभाँति वाकिक नहीं हूँ। सराय में उतरा हूँ। नींद आ रही थी, इसलिए बाहर निकल पड़ा हूँ।'

होटल में बैठा हुआ यह वृद्ध मौलवी सैयद से हार गया था, मानो उसकी विद्वत्‍ता भी हार गई थी। इस हार से मन में उत्‍पन्‍न हुए अभाव और आत्‍मलीन जलन को वह शांत करना चाहता था। 'सैयद सॉब बहुत अच्‍छे आदमी हैं, हम लोगों पर उनकी बड़ी मे‍हरबानी है।'

नयुवक ने बात काट कर पूछा, 'आप कहाँ काम करते हैं?'

'मैं मस्जिद मदरसे में पढ़ाता हूँ। जी हाँ, गुजर करने के लिए काफी हो जाता है।' उसकी आँखें सहसा म्‍लान हो गईं और वह चुप हो कर, गरदन झुका कर, नीचे देखने लगा। फिर कहा, 'जी हाँ, दस साल पहले शादी हो चुकी थी। मालूम नहीं था कि वह गहने समेट करके चंपत हो जाएगी। ...तब से इस मस्जिद में हूँ।'

युवक ने देखा कि बूढ़ा एक ऐसी बात कह गया है जो एक अपरिचित से कहना नहीं चाहिए। बूढ़े ने कुछ ज्‍यादा नहीं कहा। परंतु इतने नैकट्य की बात सुन कर युवक की सहानुभूति के द्वार खुल गए। उसने बूढ़े की सूरत से ही कई बातें जान लीं, वही दु:ख जो किसी-न-किसी रूप में प्रत्‍येक कुचले मध्‍यवर्गीय के जीवन में मुँह फाड़े खड़ा हुआ है।

'जी हाँ, मस्जिद में पाँच साल हो गए, पंधरा रुपया मिलते हैं, गुजर कर लेता हूँ। लेकिन अब मन नहीं लगता। दुनिया सूनी-सूनी-सी लगती है। इस लड़ाई ने एक बात और पैदा कर दी है - दिलचस्‍पी! रेडियो सुनने में कभी नागा नहीं करता। रोज कई अखबार टटोल लेता हूँ। जी हाँ, एक नई दिलचस्‍पी। किताब पढ़ने का मुझे शौक जरूर है। पर मैं तालीमयफ्ता हूँ नहीं। तो, गर्जे कि समझ में नहीं आती।'

बूढ़ा अपनी नर्म, रेशमी, सितार के हलके तारों की गूँज-सी आवाज में कहता जा रहा था। बातें मामूली तथ्‍यात्‍मक थीं, परंतु उनके आस-पास भावना का आलोकवलय था। उसकी जिंदगी में आहत भावनाओं की जो तर्कहीन शक्ति थी, वह उसकी बातों की साधारणता में अपूर्व वैयक्तिक रंग भर देती थी।

युवक को यह अच्‍छा लगा। प्रिय मालूम हुआ। एक क्षण में उसने अपनी सहानुभूति की जादुई आँख से जान लिया कि कोई असंगत (अजीब) मस्जिद होगी, जहाँ रोज चुपचाप लोग यंत्रचालित-सी कतार में प्रार्थना पढ़ते होंगे। और उसकी सूनी, खाली, दूसरी मंजिल पर यह असंतुष्‍ट और जीवनपूर्ण अर्द्ध-वृद्ध छोटे-छोटे मैले-कुचैले लड़के-लड़कियों को दुपहर में पढ़ाता होगा। अपने लड़कों की ऊधम से परेशान माँ-बाप उन्‍हें काम में जुटाए रखने के लिए मदरसे में भेज देते होंगे, और य‍ह अनमने भाव से पढ़ाता होगा और अपनी जिंदगी, दुनिया और दुपहर का सारा क्रुद्ध सूनापन इसके दिल में बेचैनी से तड़पता होगा...।

उसने मौलवी से पूछा, 'अपकी उम्र क्‍या होगी!'

युवक ने देखा कि मौलवी को यह सवाल अच्‍छा लगा। उसका चेहरा और भी कोमल होता-सा दिखाई दिया। उसने कहा, 'सिर्फ चालीस। यद्यपि मैं पचास साल के ऊपर मालूम होता हूँ। अजी, इन पाँच सालों ने मुझको खा डाला। फिर भी मैं कमजोर नहीं हूँ। काफी हट्टा-कट्टा हूँ।'

मौलवी यह सिद्ध करना चाहता था कि अभी वह युवक है। जीवन की स्‍वाभाविक, स्‍वातंत्र्यर्ण, उच्‍छृंखल आकांक्षा-शक्तियाँ उसके शरीर में तारल्‍य भर देती थीं। उसके चलने में, बातचीत में वह अंतिमता नहीं थी जो शैथिल्‍य और उदासी में पक्‍वता का आभास पैदा कर देती हैं। उसने चालीस ठीक कहा था और नवयुवक को भी उसकी बात पर अविश्‍वास करने की इच्‍छा न हुई।

'ओफ्फो, तो आप जवान हैं।' युवक ने थम कर आगे कहा, 'तो आपका दिमाग लड़ाई पर जरूर चलता होगा...'

'अरे, साहब! कुछ न पूछिए, सैयद साहब मुझसे परेशान हैं।'

'आप 'कौमी जंग' पढते हैं? आपके होटल में तो मैंने अभी ही देखा है।'

'कौमी-जंग तो हमारी मस्जिद में भी आता है! हमारे सबसे बड़े मौलवी परजामंडल के कार्यकर्ता हैं। जमीयत-उल-उलेमा हिंद के मुअज्जिज हैं। वहीं के उलेमा हैं। सब तरह के अखबार खरीदते हैं। यहाँ उन्‍होंने मुस्लिम-फारवर्ड ब्‍लॉक खोल रखा है।'

युवक को यहाँ की राजनीति में उलझने की कोई जरूरत नहीं थी। फिर भी, उससे अलग रहने की भी कोई इच्‍छा नहीं थी। इतने में एक गली आ गई जिसमें मुड़ने के लिए मौलवी तैयार दिखाई दिया। युवक ने सिर्फ इतना ही कहा, 'किताबों के लिए हम आपकी मदद करेंगे। अब तो मैं यहाँ हूँ कुछ दिनों के लिए। कहाँ मुलाकात होगी आपसे?'

'सैयद साहब की होटल में। जी हाँ, सुबह और शाम!'

मौलवी साहब के साथ युवक का कुछ समय अच्‍छा कटा। वह कृतज्ञ था। उसने धन्‍यवाद दिया नहीं। उसकी जिंदगी में न मालूम कितने ही ऐसे आदमी आए हैं जिन्‍होंने उस पर सहज विश्‍वास कर लिया, उसकी जिंदगी में एक निर्वैयक्तिक गीलापन प्रदान किया। जब कभी युवक उन पर सोचता है। उनके झरनों ने उनकी जिंदगी को एक नदी बना दिया। उनमें से सब एक सरीखे नहीं थे। और न उन सबको उसने अपना व्‍यक्तित्‍व दे दिया था। परंतु उनके व्‍यक्तित्व की काली छायाओं, कंटकों और जलते हुए फास्‍फोरिक द्रव्‍यों, उनके दोषों से उसने नाक-भौं नहीं सिकोड़ी थी। अगर वह स्‍वयं कभी आहत हो जाता, तो एक बार अपना धुआँ उगल चुकने के बाद उनके व्रणों को चूमने और उनका विष निकाल फेंकने के लिए तैयार होता। उनके व्‍यक्तित्‍व की बारीक से बारीक बातों को सहानुभूति के मायक्रोस्‍कोप (बृहद्दर्शक ताल) से बड़ा करके देखने में उसे वही आनंद मिलता था, जो कि एक डॉक्‍टर को। और उसका उद्देश्‍य भी एक डॉक्‍टर का ही था। उसमें का चिकित्‍सक एक ऐसा सीधा-सादा हकीम था, जो दुनिया की पेटेंट दवाइयों के चक्‍कर में न पड़ कर अपने मरीजों से रोज सुबह उठने, व्‍यायाम करने, दिमाग को ठंडा रखने और उसको दो पैसे की दो पुड़िया शहद के साथ चाट लेने की सलाह देता था। सहानुभूति की एक किरण, एक सहज स्‍वास्‍थ्‍यपूर्ण निर्विकार मुसकान का चिकित्‍सा-संबंधी महत्‍व सहानुभूति के लिए प्‍यासी, लँगड़ी दुनिया के लिए कितना हो स‍कता है - यह वह जानता था! इसलिए वह मतभेद और परस्‍पर पैदा होने वाली विशिष्‍ट विसंवादी कटुताओं को बचा कर निकल जाता था। वह उन्‍हें जानता था और उसकी उसे जरूरत नहीं थी! दुनिया की कोई ऐसी कलुषता नहीं थी जिस पर उलटी हो जाय - सिवा विस्‍तृत सामाजि‍क शोषणों और उनके उत्‍पन्‍न दंभों और आदर्शवाद के नाम पर किए गए अंध अत्‍याचारों, यांत्रिक नैतिकताओं और आध्‍यात्मिक अहंताओं की तानाशाहियों को छोड़ कर! दुनिया के मध्‍यवर्गीय जनों के अनेक विषों को चुपचाप वह पी गया था, और राह देख रहा था सिर्फ क्रांति-शक्ति की! परंतु इससे उसको एक नुकसान भी हुआ था! व्‍यक्ति उसके लिए महत्‍वपूर्ण नहीं था, व्‍यक्तित्‍व अधिक, चाहे वह व्‍यक्तित्‍व मामूली ही हो और वह भी तभी जब तक उसकी जिज्ञासा और उष्‍णता का तालाब सूख न जाए। उसकी उष्‍णता का दृष्टिकोण भी काफी अमूर्त था क्‍योंकि उसके व्‍यक्तित्‍व का उद्देश्‍य अमूर्त था। इसलिए अपने आप में व्‍यक्ति उससे यदा-कदा छूट जाता था, सिवा उनके जो उसकी धड़कनों और रक्‍त के साथ मिल गए हैं! हकिम मरीजों को फौरन भूल जाते हैं, और मजे के लिए और मर्ज के साथ-साथ वे याद आते है। परिणामत: उसकी सहज उष्‍णता पा कर व्‍यक्ति उसके साथ एक हो जाते, अपने को नग्‍न कर देते; और फिर उससे नाना प्रकार की अपेक्षाएँ करने लगते जो संभव होना असंभव था।

मौ‍लवी जब गली में मुड़ कर गया तो युवक की आँखें उस पर थीं। मौलवी का लंबा, दुबला और श्‍वेत वस्‍त्रवृत सारा शरीर उसे एक चलता-फिरता इतिहास मालूम हुआ। उसकी दाढ़ी का त्रिकोण, आँखों की चपल-चमक और भावना-शक्तियों से हिलते कपोलों का इतिहास जान लेने की इच्‍छा उसमें दुगुनी हो गई।

तब सड़क के आधे भाग पर चाँदनी बिछी थी और आधा भाग चंद्र के तिरछे होने के कारण छायाच्‍छन्‍न हो कर काला हो गया था। उसका कालापन चाँदनी से अधिक उठा हुआ मालूम हो रहा था।

युवक के सामने समस्‍याएँ दो थीं। एक आराम की, दूसरी आराम के स्‍थान की। और दो रास्‍ते थे। एक, कि रात-भर घूमा जाए - रात के समाप्‍त होने में सिर्फ साढ़े तीन घंटे थे और दूसरे, स्‍टेशन पर कहीं भी सो लिया जाए!

कुछ सोच-विचार कर उसने स्‍टेशन का रास्‍ता लिया।

उसके शरीर में तीन दिन के लगातार श्रम की थकान थी। और उसके पैर शरीर का बोझ ढोने से इनकार कर रहे थे। परंतु जिस प्रकार जिंदगी में अकेले आदमी को अपनी थकान के बावजूद भोजन खुद ही तैयार करना पड़ता है - तभी तो पेट भर सकता है - उसी प्रकार उसके पैर चुपचाप, अपने दु:ख की कथा अपने से ही कहते हुए अपने कार्य में संलग्‍न थे।

उसको एक बार मुड़ना पड़ा। वह एक कम चौड़ा रास्‍ता था जिसके दोनों ओर बड़ी-बड़ा अट्टालिकाएँ चुपचाप खडी थीं, जिसके पैरों-नीचे बिछा हुआ रास्‍ता दो पहाड़ियों में से गुजरे हुए रास्‍ते की भाँति गड्ढे में पड़ा हुआ मालूम होता था। बाईं ओर की अट्टालिकाओं के ऊपरी भाग पर चाँदनी बिछी हुई थी।

थकान से शून्‍य मन में नींद के झोंके आ रहे थे, परंतु एक डर था पुलिसवाले का जो अगर रास्‍ते में मिल जाए जो उसके संदेहों को शांत करना मुश्किल है! डर इसलिए भी अधिक है कि रास्‍ता अँधेरे से ढँका हुआ है, सिर्फ अट्टालिकाओं पर गिरी हुई चाँदनी के कुछ-कुछ प्रत्‍यावर्तित प्रकाश से रास्‍ते का आकार सूझ रहा है।

मन में शून्‍यता की एक और बाढ़। नींद का एक और झोंका। रास्‍ता दोनों ओर से बंद होने के कारण शीत से बचा हुआ है - उसमें अधिक गरमी है।

युवक कैसे तो भी चल रहा है! नींद के गरम लिहाफ में सोना चाहता है। नींद का एक और झोंका! मन में शून्‍यता की एक और बाढ़।

युवक के पैरों में कुछ तो भी नरम-नरम लगा - अजीब, सामान्‍यत: अप्राप्‍य, मनुष्‍य के उष्‍ण शरीर-सा कोमल! उसने दो-तीन कदम और आगे रखे। और उसका संदेह निश्‍चत में परिवर्तित हो गया। उसका शरीर काँप गया। उसकी बुद्धि, उसका विवेक काँप गया। वह यदि कदम नहीं रखता हैं तो एक ही शरीर पर - न जाने वह बच्‍चे का है या स्‍त्री का, बूढ़े का या जवान का - उसका सारा वजन एक ही पर जा गिरे। वह क्‍या करे? वह भागने लगा एक किनारे की ओर। परंतु कहाँ-वहाँ तक आदमी सोए हुए थे उसके शरीर की गरम कोमलता उसके पैरों से चिपक गई थी। वहीं एक पत्‍थर मिला; वह उस पर खड़ा हो गया, हाँफता हुआ। उसके पैर काँप रहे थे। वह आँखे फाड़-फाड़ कर देख रहा था। परंतु अँधेरे के उस समुद्र में उसे कुछ नहीं दीखा। यह उसके लिए और भी बुरा हुआ। उसका पाप यों ही अँधेरे में छिपा रह जाएगा! उसकी विवेक-भावना सिटपिटा कर रह गई; उसको ऐसा धक्‍का लगा कि वह सँभलने भी नहीं पाया। वह पुण्‍यात्‍मा विवेक शक्ति केवल काँप रही थी!

युवक के मन में एक प्रश्‍न, बिजली के नृत्‍य की भाँति मुड़ कर मटक-मटक कर, घूमने लगा - क्‍यों न‍हीं इतने सब भूखे भिखारी जग कर, जाग्रत हो कर, उसको डंडे मार कर चूर कर देते हैं - क्‍यों उसे अब तक जिंदा रहने दिया गया?

परंतु इसका जवाब क्‍या हो सकता है?

वह हारा-सा, सड़क के किनारे-किनारे चलने लगा! मानो उस गहरे अँधेरे में भी भूखी आत्‍माओं की हजार-हजार आँखें उसकी बुजदिली, पाप और कलंक को देख रहीं हों। स्‍टेशन की ओर जानेवाली सीधी सड़क मिलते ही युवक ने पटरी बदल ली।

लंबी सीधी सड़क पर चाँदनी आधी नहीं थी क्‍योंकि दोनों ओर अट्टालिकाएँ नहीं थीं; केवल किनारे पर कुछ-कुछ दूरियों से छोटे-छोटे पेड़ लगे हुए थे। मौन, शीतल चाँदनी सफेद कफन की भाँति रास्‍ते पर बिछती हुई दो क्षितिजों को छू रही थी। एक विस्‍तृत, शांत खुलापन युवक को ढँक रहा था और उसे सिर्फ अपनी आवाज सुनाई दे रही थी - पाप, हमारा पाप, हम ढीले-ढाले, सुस्‍त, मध्‍यवर्गीय आत्‍म-संतोषियों का घोर पाप। बंगाल की भूख हमारे चरित्र-विनाश का सबसे बड़ा सबूत। उसकी याद आते ही, जिसको भुलाने की तीव्र चेष्‍टा कर रहा था, उसका हृदय काँप जाता था, और विवेक-भावना हाँफने लगती थी।

उस लंबी सुदीर्घ श्‍वेत सड़क पर वह युवक एक छोटी-सी नगण्‍य छाया हो कर चला जा रहा था।

अँधेरे में - गजानन माधव मुक्तिबोध

चौपाल - गीताश्री

'बीजू साहब, अब क्लब नहीं आएंगे। वे दिल्ली से बाहर चले गए हैं। नौकरी वगैरह या परिवार... मालूम नहीं मैम...' वेटर ललित थोड़ा मायूस था। हाथ में अभी भी उसके बियर की एक बोतल थी और एक खाली ग्लास। शिवांगी सन्न रह गई थी उस खबर से।

'फिर ये क्यों लाए हो?' वेटर के हाथ में बियर की तरफ देखते हुए पूछा।

'ये परसों जाते हुए बीजू साब ने कहा था, आप जब आएं तो उनकी तरफ से बियर आपको पिलाई जाए।' उसने बियर की बोतल टेबल पर रख दी। शिवांगी चकरा गई। ये क्यों, जो कहीं चला गया, जो अजनबी था, वो जाते-जाते ऐसा क्यों कर गया? मन ही मन कुछ खालीपन सा लगा। कुछ पल के लिए सब क्लब और बियर का स्वाद गायब हो चुका था।

वह वहीं कुर्सी पर बैठ गई। वेटर ने पूछा, 'कुछ खाने को लाऊं क्या।'

ऊं...ऊं...हं...नहीं... शिवांगी वहां से दूर थी कहीं। शायद काउंटर के उस कोने में, जहां कुर्सी अब तक खाली थी, मगर हल्के-हल्के हिल रही थी। जैसे कोई अभी-अभी उठकर गया हो कहीं, वापस आने के लिए। किसी के होने का अहसास बाकी था।

आज कई दिनों बाद वह क्लब आई थी। इस बीच क्लब में ऐसा क्या हुआ, उसे पता नहीं, लेकिन आज पहली बार उसे गेट पर टोका-रोका गया।

पहले वह बेधड़क घुस आया करती थी। कभी अकेली, तो कभी दोस्तों के साथ। क्लब का माहौल उसे रास आने लगा था। धीरे-धीरे वह यहां की मेंबरशिप लेने के बारे में गंभीरता से सोचने लगी थी।

आज गेट पर रोकते हुए संजू ने कहा, 'मैम, यहां गेस्ट के अकेले आने पर रोक लग गई है। यहां देखिए नोटिस लगा है। आपको किसी मेंबर के साथ आना पड़ेगा।'

'मैं यहां खाने-पीने नहीं, किसी से मिलने आई हूं, एक नजर मारकर आती हूं। मिल गया तो उसकी गेस्ट, नहीं तो वापस...।'

कहते-कहते सोमू को वहीं मनाही की मुद्रा में छोड़कर हॉल में प्रवेश कर गई।

मन ही मन बड़बड़ा भी रही थी, क्या बकवास नियम बना लिए हैं। अब कैसे आऊंगी। रजनी मेंबर है, पर उसको पकड़ पाना मुश्किल है।

पर अंदर पहुंचते ही दिल धक से रह गया। वह आज ठानकर आई थी कि चाहे जो हो, काउंटर के कोने पर बैठने वाले उस शख्स से मिलकर रहेगी। देखूं तो सही, कौन है, कैसा दिखता है, क्यों कर रहा है ऐसा, क्या इंटरेस्ट है, मगर सारे मंसूबों पर पानी फिर गया। कोना खाली, आसपास लोग थे। अपने में मशगूल। लोगों ने वह कुर्सी इसलिए छोड़ दी होगी कि 'बीजू साहब' आएंगे।

वेटर तो कह रहा है कि अब वह नहीं आएंगे। दिल्ली से बाहर चले गए। कोई अता-पता भी नहीं दे गए। वह कम से कम एक धन्यवाद का पत्र लिख देती।

उसने दूर खड़े ललित को इशारे से बुलाया, 'बीजू साहब का फोन नंबर तेरे पास है? दिल्ली वाले घर का पता तो होगा, ऑफिस में? ला देगा?'

ललित शिवांगी की बेचैनी समझ रहा था।

'मैम, वे मेरा फोन नंबर ले गए है। मुझे फोन करेंगे, ऐसा कह रहे थे। घर का पता आपको ऑफिस से मिलेगा, आपको देंगे नहीं। आप मेंबर नहीं हो न...।'

'अब क्या करें? बियर लौटा ले जाओ।'

'नहीं मैम... अब नहीं लौटेगी। बीजू साब पहले ही पे कर चुके हैं। मुझे कहा था, मैडम आएं तो उन्हें बियर पिलाना, जाने मत देना ऐसे...।'

शिवांगी फट पड़ना चाहती थी। न क्लब उसे आनंद दे रहा था, न बियर की बोतल खींच रही थी। उसका दिमाग पूरे माहौल से बेखबर कहीं और था।

वह महानगर का सबसे बदनाम क्लब था। जहां ठीक 11 बजे बार काउंटर खुल जाता था। कुछ खुर्राट लोग अपने दिन की शुरुआत शराब के कुल्ले से करते थे।

'दो पेग भीतर फिर देवता पित्तर' की तर्ज पर क्लब को ये लोग आबाद रखते थे। अनजाने में कोई गैर-शराबी पहुंच जाता तो उसकी आंखें भले फटी रह जाएं, पीने वालों को कोई फर्क नहीं पड़ता। वे हाथ में गिलास लिए टीवी पर खबर देखते हुए, शाम को अपने-अपने अखबारों को क्या खबर भेजेंगे, इसकी प्लानिंग करते थे। फील्ड में घुसने वालों को बेचारा और अनुभवहीन समझकर हिकारत भरी नजरों से देखते। कुछ को तो फटकार भी लगा देते। फटकार सुनने वाले ...हें...हें करते हुए दादा... दादा... करते और कृपापूर्वक एकाध पेग मुफ्त में गटक जाते। क्या फर्क पड़ता है, अगर डांट शराबी की हो। डांट की फितरत सर के ऊपर से गुजरने की होती है। और शराब रगों में दौड़ती है। यह क्लब नहीं खबरों का चंडूखाना है। शाम को तो यहां और भी उजबक किस्म का माहौल होता है। धुएं और शराब के साथ कानफाड़ू शोर।

शिवांगी को यह सब बड़ा अजीब लगता था। वह क्लब जाने को बेचैन थी। पर बात तो सही थी कि यहां क्या-क्या होता है। क्या सही में वे बातें होती हैं जो उसने सुनी हैं? शिवांगी के कानों में और भी भयानक बातें आई थीं। पर वह भयभीत नहीं हुई। उसे लगा कि खुद जाकर अनुभव करेगी कि माहौल कैसा है।

उसे एक गैर-शराबी मित्र ने समझाया - 'क्या करेगी जाकर, वहां दो गुटों में एक बार गोली तक चल गई थी। पुलिस आ गई थी।'

दूसरे ने समझाया, 'अरे यही नहीं, एक बार तो फलां अखबार के चीफ रिपोर्टर को हार्ट अटैक पड़ा, पीते-पीते क्लब में ढेर हो गए। किसी ने अस्पताल नहीं पहुंचाया।'

इतनी मार्मिक और दिल दहलाऊ खबर भी शिवांगी को नहीं डिगा पाई। भुतहा हवेली में जाने से पहले जैसे किसी को डराया जाता है, ठीक वैसे ही शिवांगी को डराया जा रहा था। तब से उसने अपने ऑफिस में ऐलान किया कि जो भी उस क्लब का मेंबर है कृपया उसे वहां ले जाए।

दुर्भाग्य से कोई नहीं था। सिवाय बॉस के। जो क्लब में लूटने पिटने की बजाय 'कार-ओ-बार' से ही काम चला लेते थे। शराब पीने की नई पद्धति 'कार-ओ-बार' धीरे-धीरे चलन में आ रही थी। मगर शिवांगी को तो जाना ही था। जिद जो ठहरी। नई जगह देखने और क्लब में पुरुषों के बीच बैठकर चुनौती देते हुए शराब पीने की जिद। देखेंगे, जो होगा, ऊंह... उसने गर्दन झटकी।

अगले दिन उसने सोचा, क्यों न अकेली चक्कर लगा आऊं। एक बार सुबह-सुबह और फिर शाम को। माहौल दिखेगा। खाने-पीने को भले कुछ न मिले। मेंबर भी नहीं, सो कोई अटेंड नहीं करेगा। ज्यादा लोगों को वह जानती नहीं थी। अभी-अभी तो रायपुर से दिल्ली आई थी। उसके लिए सबकुछ कौतूहल भरा था। कोई और होता तो उसे क्लब की खबरें सुनकर सांस्कृतिक धक्का लगता। शिवांगी जरा कठोर मिट्टी पानी की बनी हुई थी। जब तक पंगा न हो मन चंगा कैसे रहे। ना इमेज की परवाह ना अफवाहों का। जो होगा, सो देखा जाएगा। सो चल पड़ी अकेली। जैसा सुना था, वैसा ही पाया। वैसे ही काउंटर पर कुछ अघाए हुए लोग बतकहियां करते हुए। टेबलों पर जमे हुए अनजाने से लोग। शायद कुछ परिचित चेहरे थे जो यदा कदा मुफ्त खाने और गिफ्ट लेने के लिए प्रेस कांफ्रेंस में दिखाई दे जाते हैं।

गेट पर किसी ने टोका, 'आप नई लग रही हैं।'

'हां... मैं नहीं, मेरा दोस्त मेंबर है वो आ रहा है, उसने मुझे कहा है, मैं हॉल में उसका इंतजार करूं। वो आता ही होगा।'

गेट पर सोमू बैठा था। उसने अंदर जाने का इशारा किया।

एक कोने में टेबल चुनकर बैठ गई। वहां से वह सबको देख सकती थी। मगर वह कम दिखाई देती। थोड़ी सकुचाई सी थी। झूठ बोलकर अंदर आई थी। थोड़ी देर में वेटर आएगा, मेंबरशिप नंबर पूछेगा, फिर क्या करेगी?

'करना क्या है, चुपचाप उठकर चल देंगे, कहेंगे दोस्त नहीं आएगा, कहीं फंस गया।' - वह बुदबुदाई। आश्वस्त होकर चारों तरफ नजर दौड़ाना शुरू कर दिया। उसे ऐसा कोई नजर नहीं आया, जिसके साथ हेलो भी किया जा सके। वेटर आया।

'मैम, कुछ लेंगी? क्या लाऊं आपके लिए? अभी वोदका पर एक स्कीम चल रही है - एक पेग के साथ एक पेग फ्री...।'

शिवांगी ने बीच में ही रोक दिया। 'अभी रुक जाओ, मैं मेंबर नहीं हूं। मेरा दोस्त आने वाला है। वो आ जाए, फिर आर्डर करते है। ...मेनू रख जाओ।'

वेटर छोटी सी पर्ची वाला मेनू रख गया। यह दुनिया का सबसे छोटा मेनू होगा, उसने सोचा।

क्लब में चहल-पहल बढ़ने लगी थी। बुधवार का दिन था। सप्ताह का मध्यांत। शिवांगी को लगा वेटर दूर से उसे घूर रहा है। उसकी आंखों में शंका झांक रही थी। शिवांगी ने उससे नजर हटाकर दूसरे टेबल पर देखा। दावत का सा नजारा था। एक सदस्य के साथ-साथ चार-चार दावत उड़ाने वाले। इस टेबल का वेटर मेंबर से आर्डर लेने आता तो मेंबर हर बार पास बैठे एक मोटे से आदमी से कहता, आर्डर करो, वह बिल्डर या व्यापारी सा दिखने वाला कहीं वेटर को थोक में ऑर्डर लिखवाने लगा। मेंबर ऐसे बैठा था, जैसे उसने सब पर कोई गहरा उपकार किया हो, यहां लाकर। शिवांगी की समझ में आ गया, ओह तो ये माजरा है, ऑर्डर देने का मतलब, स्साले भुगतान भी करो।

लगता है मोटा आसामी फांस लाया है। बेटा आज...

'मैम, आपके लिए ड्रिंक...'

'क्या? कैसे? क्यों भई, किस खुशी में?'

'वो काउंटर पर बैठे, बीजू सर ने भेजा है आपके लिए।'

वेटर के हाथ में बियर की बोतल और ग्लास थी।

शिवांगी की हैरान नजरें उठीं... काउंटर के कोने पर अकेले, चुपचाप अधपके बालों वाले एक सज्जन बैठे थे। उनकी पीठ दिखाई दे रही थी।

'मेरे लिए... क्यों भेजा... क्या कहा उन्होंने?'

शिवांगी लगभग वापस करने की मुद्रा में थी।

'मैं वापस नहीं जा सकता, मैम... पर्ची कट चुकी है। साब के नंबर पर आया है। वो शायद जानते होंगे आपको इसलिए भेजा होगा - आप खुद पूछ लीजिए उनसे। हमें तो कहा है आपके टेबल पर रख दूं' - कहते-कहते बियर की बोतल और ग्लास टेबल पर भरकर चला गया।

शिवांगी ने प्रतिवाद नहीं किया। वह उस आदमी का चेहरा देखना चाहती थी। क्या करे। क्या काउंटर पर जाते देखना चाहती थी। क्या करें क्या काउंटर पर जाए देखने। वह पीठ किए बैठा है। अजीब आदमी है। किसी अजनबी को ऐसे ड्रिंक ऑफर करता है क्या?

क्या करना है, छोड़ों, हमें क्या? पी जाते हैं, पंगा होगा तो देखेंगे। और शिवांगी की क्लबबाजी का दौर बियर की पहली बोतल के साथ शुरू हो गया।

पीते हुए उसकी आंख उस आदमी की पीठ पर गड़ी रही। कुछ सवाल घुमड़ रहे थे जिन्हें वह बियर की ठंडी घूंट के साथ गटक रही थी।

वह आदमी भी शायद बियर पी रहा था। उसके बगल वाली ऊंची कुर्सी पर कई लोग जमे हुए, ठहाके लगा रहे थे, शोर उठ रहा था। मगर उस आदमी को कोई फर्क पड़ता नहीं दिख रहा था। चुपचाप पीने से व्यस्त था।

शिवांगी उसका चेहरा देखने की असफल कोशिश कर रही थी।

लगता है, पटाने की कोशिश है, उसने आम लड़कियों की तरह सोचा। बियर पीकर वह उस आदमी के पास जाएगी जरूर। सोचते ही... कुछ खाने की इच्छा जोर मार रही थी वेटर को खोजने के लिए इधर-उधर नजर घुमाई। दिखा नहीं। फिर काउंटर की तरफ देखा - अपनी सीट से वह आदमी गायब था। हें... कहां गया? एकदम से गायब बिना मिले, बताए... ये बीजू साब है क्या बला? किससे पूछे, अभी तक कोई उसका परिचित दिखा नहीं था।

इस आश्चर्यजनक घटना को अपने दफ्तर के साथियों के बीच बांटने को आतुर वह बियर खत्म करके उठी और चलती बनी।

दो दिन बाद वह रजनी के साथ क्लब में फिर हाजिर थी। उसने रजनी को सारा दिलचस्प हाल सुना दिया था। सुनाने में पता चला कि रजनी पुरानी मेंबर है पर कम आती है डेस्क जॉब में उसे फुर्सत ही कहां मिलती है? रजनी के पति अपने दोस्तों के साथ क्लब का ज्यादा लुत्फ उठाते है। रजनी, शिवांगी फिर उसी टेबल पर बैठे। आज शिवांगी आश्वस्त थी। एक मेंबर के साथ थी और अकेली नहीं थी। कुछ भी निर्भय होकर आर्डर कर सकती थी। 'क्लब का चस्का' ऐसा उसने अब तक सुना था, शिवांगी को लग रहा था कि कहीं भी ना यह रोग लग जाए। वह शराबी नहीं, मगर हवा में नशे के बाद जो धुन सुनाई देती है, उसे वह पसंद है। वह चाहे क्लब में हो या घर में या कार-ओ-बार में।

अभी तक अपने 'बियर प्रेम' को उसने जगजाहिर नहीं किया था। उसे पता था कि 'स्मॉल टाउन गर्ल' को लोगों ने शराब पीते देखा तो उनकी फट जाएगी।

पहले ही दिन देखा नहीं, एक बिल्डर टाइप आदमी कैसे कनखियों से घूरे जा रहा था जैसे शराब के साथ घोल कर पी जाएगा स्साला। नहीं, जरा भी हिचकेगी नहीं। घूर साले... घूर... कितना घूरेगा। एक झन्नाटेदार झापड़ लगा तो दिन में भी सितारे नजर आ जाएंगे। हर आने जाने वाला वैसे एक बार उस पर नजर डाल ही लेता था। कहीं-कहीं इस 'नई एंट्री' को देखकर लोग फुसफुसा भी रहे थे। इन सबसे बेखबर बेखौफ एक उन्मुक्त लड़की अन्य मर्द शराबियों की सत्ता को चुनौती देने में आह्लादित थी।

'कहां खो गई... कुछ आर्डर कर ना... वो वहां बैठा है तो आशिक... रजनी ने उसे टोका।

शिवांगी अपने ख्यालों में वापिस आई।

'अरे, मैं कैसे आर्डर करूं - तू मेंबर है, तुझे सब पता है। मेरी बात कौन सुनेगा। मेंबरशिप न. भी तो पूछेंगें...'

शिवांगी की आवाज में खिलंदड़ापन था।

वेटर ने आते ही मेंबरशिप न. पूछा। रजनी ने बताया, 133...।

जब तक रजनी आर्डर करती रही, शिवांगी की आंखें काउंटर की तरफ गई। वह सज्जन नदारद थे। शिवांगी को थोड़ी राहत महसूस हुई। पता नहीं क्यों? वह फिर किसी असहज स्थिति में नहीं पड़ना चाहती थी। पर उसे क्या पता था कि 'राहत' कई बार महसूस होकर भी रह जाती है, मिलती नहीं। सामने सीट पर ललित वेटर एक बोतल बियर लिए खड़ा था।

'मैम... बीजू साहब ने आपके लिए भेजा है।' वह मुस्करा रहा था।

'क्यों भाई, क्यों भेजा? कहां हैं, वे तो दिख नहीं रहे। मैं नहीं लेती, उन्हें बताओ। पहले आकर मिलें फिर उनकी बियर स्वीकार करूंगी।'

शिवांगी बियर लौटाने के मूड में थी। आज जो हो जाए। वह बिना मिले बिना जाने, बिल्कुल बियर को हाथ नहीं लगाना। वेटर ने बोतल टेबल पर रख दी।

'मैम, आप जानती हैं, वापस नहीं होगा बीजू साहब अभी-अभी गए है। आपको देखा था उन्होंने, मुझे बुलाकर आर्डर दिया कि मैडम को मेरी तरफ से बियर दे आओ और आपको 'हाय' कहने को भी कहा है।'

बोलते-बोलते वेटर वहां से निकल गया। दूसरे टेबल से किसी ने आवाज लगाई थी।

क्लबों में लड़कियों से ज्यादा बात करें तो पेशेवर शराबियों को बहुत चुभती है।

'पी ले, पी ले... तेरा 'बीजू' तो आज भी निकल लिया यार, कुछ भी कह, आदमी बेहद शरीफ, दिलचस्प और रहस्यमय लग रहा है।'

'क्या यार, तू भी न...।'

'सच, कुछ तो बात है उस आदमी में। तेरे से मिला नहीं, तुझे जानता नहीं, बस देखा भर होगा। इस फटीचर क्लब में, जहां एक पैग के लिए लोग शाम को मुर्गे तलाशते है या बाहर से किसी को फांस लाते है, तुझे वह आदमी बियर ऑफर कर रहा है, एक बार नहीं, दो बार...।'

रजनी को इस पूरे प्रकरण में रोमांच हो रहा था। शिवांगी थोड़े हैरान और चिंतित दिखाई देने लगी।

'क्या रे... यार अच्छा नहीं लगता।'

इस तरह किसी अजनबी की बियर...

रजनी थोड़ा उसके कान के पास झुक आई।

'मेरी सलाह मान, एडवेंचर करते हैं। तू हर दूसरे-तीसरे दिन आ, जब वक्त मिले। मजे ले, देख ये आदमी किस हद तक जाता है।

फिर ऑफर करता है या नहीं? चक्कर क्या है ये चुपचाप फॉलो कर। उसके बारे में वेटर या किसी और से ज्यादा बात मत कर, पूछताछ ना कर। बात फैलेगी तो, यह चंडूखाना है। तेरी खबर प्रेस रिलीज बनाकर बांचेंगे। ये लोग। कुछ लोगों को दफ्तर की कोई जिम्मेदारी है नहीं। बस लड़कियों पर गॉसिप करना इनका फेवरेट शगल है। मैं इसलिए यहां कम आती हूं। कभी रमेश (पति) साथ हुआ तो आ गई। इसलिए गॉसिप से बची हूं। देखती नहीं, औरतें, लड़कियां कितनी कम हैं यहां।'

क्यों आएं - लड़कियां यहां...? सारे शहर के शराबी यहां इकट्ठा हों, और लड़कियां रोज आएं तो उनसे बड़ी 'छिनाल' कोई नहीं। हिप्पोक्रेट स्साले...।'

रजनी धाराप्रवाह बोलती जा रही थी।

शिवांगी उसे सुनकर हैरान थी। इतना कुछ भरा है उसके भीतर। मवाद फूट गया है। यह कोई नई रजनी है।

उसने रजनी के हाथों पर हाथ रखा। बेहद गर्म हाथ थे। केदारनाथ सिंह ने शायद इन्हीं हाथों के लिए वो पंक्तियां लिखी होंगी... 'दुनिया को इन्हीं हाथों की तरफ गरम और सुंदर होना चाहिए...।'

'देख तू कुछ दिन यहां आ, वो बियर भेजे पी, खुद ना जा उसके पास और ना वेटर से कुछ इक्वायरी कर। तीन-चार और ऐसा हो तो फिर मिलकर कोई रणनीति बनाएंगे। मैं देखूंगी - इस मामले को। अभी जैसा कहती हूं, करती जा। इन मर्दों को एक्सपोज करने का एक मौका मिला है हमें - कैरी ऑन...।'

रजनी और शिवांगी की वह दोपहर इस रणनीति के तहत लिपटी रही।

जब बाहर निकली तो धूप शिवांगी के इरादों के तरह नरम पड़ चुकी थी। फिर तो शुरू हुआ शिवांगी की क्लबबाजी का दौर। हर दूसरे-तीसरे दिन जान-बूझकर आती। उसी कोने वाली टेबल पर बैठती। उसी तरह ललित बियर की बोतल लेकर आता। धर जाता। बिना किसी प्रतिवाद के वह चुपचाप पी जाती। उठती और बिना हाय-हैलो किए पीछे के दरवाजे से निकल जाती। इस दौरान कभी कॉर्नर सीट वाले की, ब्रांडेड शर्ट के रंग दिखते, कभी खाली हिलती हुई कुर्सी या कभी प्रतीक्षारत कुर्सी। शिवांगी ने गौर किया, उस कुर्सी पर कोई और न बैठता नहीं था। चाहे देर तक खाली रहे। एकाध बार कोई अनजान आदमी बैठना चाहे तो ललित तुरंत दौड़कर पहुंच जाता था। कुछ कहता था धीरे से, फिर वह कुर्सी खाली हो जाती थी। न बीजू साहब शिवांगी तक आए ना शिवांगी उठकर वहां तक गई। पर खामोश संवाद जारी था। एक मौन युद्ध जारी था। दो योद्धा भिड़ नहीं रहे थे बस। बीजू साब रहें ना रहें, शिवांगी पहुंची नहीं - कि ललित थोड़ी देर में बियर लेकर हाजिर। उसे मजा भी आ रहा था, रोमांच और एक सुरसुरी भी। सवाल तो अब भी कई थे। रजनी ने मना किया था कि जल्दी ही पर्दाफाश करेगी। वह आश्वस्त थी कि वह अकेली नहीं है इस मामले में। धीरे-धीरे क्लब में इस अकेली साहसी (दुस्साहसी) लड़की को पहचानने लगे थे। कोई हाय-हैलो भी कर जाता। एकाध बार 'विघ्नसंतोषी' टाइप लोग हाय करने के लिए कुर्सी पर बैठे भी। शिवांगी का अनमनापन देखकर लौट जाते। उन्हें क्या पता कि वह चिड़िया नहीं, जिसका शिकार करने के लिए वे सालों से जाल लिए पिर रहे हैं। यहां तो 'महाआनंद' का 'महायुद्ध' खेला जा रहा था। और फिर उसकी नौबत ही नहीं आई कि योद्धा अपने सामने हों।

ललित बियर की बोतल लिए जो खबर सुना रहा था - वह लगभग हिला गया उसे।

खुद को चट्टानी इरादों वाली लड़की समझने वाली शिवांगी भरभरा गई थी। कुछ अंदर से गीला सा अहसास हुआ। जो बियर की तरह कतई ठंडा नहीं था। डबडबाई आंखों से उसने कॉर्नर वाली अविचल कुर्सी को देखा। वह कुर्सी को एक बार छूना चाहती थी। आज कुर्सी हिल नहीं रही थी। वहां उसके होने का अहसास तो बचा होगा या वह भी ले गया। बियर की बोतल वैसे ही छोड़कर लडखड़ाती हुई बाहर निकली। रजनी को फोन मिलाया। पता नहीं, दोनों में क्या बात हुई, शिवांगी ने क्लब को भरपूर नजर से देखा और बस स्टॉप की उल्टी दिशा में चल पड़ी...।
चौपाल - गीताश्री 

मैं भी जाऊँगा - गंगा प्रसाद विमल

अनेक आधी-अधूरी कथाएँ इधर-उधर कागजों में बिखरी पड़ी हैं। कभी उन्हें लिखने का मन बना तो कुछ और पन्ने जुड़ गए वरना कभी किसी न किसी वजह से वे वहीं छूट गईं। उनके मुख्य चरित्र कहाँ बिला गए नहीं पता। पर इधर वर्षों बाद उस जिस आदमी को मैं मुकम्मल कहानी समझता था, वह भी एक-दो बार पन्नों पर उतरा था। फिर कहानी आगे बढ़ ही नहीं पाई। फिर वह स्मृति से उतर विस्मृति के घटाटोप में विलीन हो गया। वही आदमी, समूचा वही आदमी उस जगह अवतरित हो गया जहाँ मैं अपने जैसे बूढ़ों के बीच जवानी की गप्पों में मस्त रहता था।

वही आदमी। आपने न देखा होगा। अरे! वैसा ही जवान जैसे वह विलुप्त होते वक्त था। ठीक वैसे ही उसके बाल। ठीक वैसा ही चेहरा। मुश्किल पहचानने में जरा भी न हुई। यहाँ तक कि उसके कपड़े भी वैसे ही थे, सलीकेदार, ठीक ढंग के रंग-रोगनवाले। मैंने अपने हाथों को देखा, वे एकदम मुरझाए हुए। रक्तविहीन सफेद। मैंने हाथ से ही तुलना कर डाली इसलिए पाठक थोड़ा अटकेंगे। सोचेंगे क्या बात हुई? अरे भाई सीधे उस आदमी पर आओ। उसके जीवन की कोई चटपटी चीज सुनाओ। आप तुलना करने लगे!

हुआ यह कि उसने भी मुझे देखा। वह चकित लग रहा था। उसे उम्मीद नहीं थी कि मुझमें इतना बदलाव आ जाएगा। फिर भी उसी ने हिम्मत की। मेरी ओर बढ़ा, अभिवादन किया। और बातचीत में पहल करने के बहाने बोला, 'तो आप... आप ही न हैं?'

मैं झेंपा। शायद इसे झेंप ही कहेंगे। तुलनात्मक रूप से वह ज्यादा प्रभावशाली लग रहा था। एक प्रभावशाली आदमी की तरफ सब खिंचते हैं। यह बात मैं पहले से गौर करता आ रहा था कि अब वे नए लोग जो किसी काम की वजह हमेशा इर्द-गिर्द मँडराते और चापलूसीभरी शब्दावली में मीठी-मीठी बातें करते अब या तो तारिकाओंवाले पन्ने पलटते रहते या ऐसे लोगों के गिर्द रहते जिनसे कुछ हासिल होनेवाला था। माफ करें इस बड़े शहर में मैंने तहसील स्तर की एकजुटता की भीड़ देख कर कहा था, जल्दी ही ऐसी नजरवालों का रुतबा बढ़नेवाला है जो अपनी तहसील को ही दुनिया समझते हैं। उनके पुरातत्त्व का महत्वपूर्ण ज्ञान उन्हीं के मुहल्ले-टोलों को मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से पुराना साबित करने की जुगत में भिड़ा रहता। असल में ये लोग बड़े लोगों के गिर्द मँडरा कर, उनके नामों की बैसाखियों के सहारे कुछ दिन चल कर अपना गंतव्य पा लेते हैं तो फिर बदलने में भी देर नहीं लगाते। मेरे एक मित्र का कहना है कि पहले ये जो साइकल रिक्शा खींचते थे कुछ दिन बाद मारुति में ठसके से चलते हैं। मैं उन्हें कहता कि भाई, ऐसे लोगों को तो मैं आदर्श समझता हूँ। ये स्वयं ही कुछ बन जाते हैं। मेरे दोस्त मुस्कुराते, कहते, इन्हें समझना थोड़ा कठिन है। चालाकी और काँइयाँपन में इनका कोई मुकाबला नहीं है। आज ये कम्युनिस्ट हैं तो कल कम्यूनलिस्ट होते इन्हें देर न लगेगी।

और इधर इस प्रवृत्ति से भिन्न यह आदमी जिसका मैं कुछ भला नहीं कर सकता था मेरी तरफ खिंचा और मुझसे सवाल कर रहा कि मैं मैं ही हूँ या कोई दूसरा आदमी। जो बूढ़े आदमियों की समान काठी में आ घुसा हो।

वर्मा, शर्मा, तिवारी, सिंह… अरे कुछ भी तो कह सकता था वह। पर इधर बढ़ती भीड़ में अब संज्ञाओं के इन नाम रूपों का महत्व खत्म हो गया था। अब अगर कोयले की दलाली या कुत्तों की खाल के व्यापार से आप अरबपति बन गए हों तो आप राय साहबों या पद्म पुरस्कारों से सज्जित संज्ञाओं से ज्यादा बड़े हैं। बशर्ते रुपए-पैसे के मामले में आप समझदार हों।

तो वह आदमी मुझसे पूछ रहा था कि सत्यापित करो कि तुम तुम ही हो। मुझे चुहल सूझ सकती थी। पर मैं उस रहस्य को जानना चाहा था कि उसके वर्तमान रूप का राज क्या है?

'छोड़िए भी सवाल-जवाब।' उसने बातों को मोड़ देना शुरू किया, 'आप आजकल क्या कर रहे हैं?'

'बस रिटायर हो चुका हूँ।'

'वह तो आपके चेहरे को देखते ही मैं समझ गया था।'

'और आप क्या कर रहे हो?'

'मैं... मैं ज्यादातर विदेश में रहता हूँ। मैं भी लिखने-पढ़ने का ही काम कर रहा हूँ।'

'तो भारत में कितने दिन रहेंगे?'

'कुछ भी तय नहीं है।'

'अचानक ही जाना पड़ेगा क्या?' मैंने पूछा।

'कुछ-कुछ वैसा ही। अब दुनिया बदल गई है। माफिक जगह पहुँच कर आप मुक्त हो जाते हैं। और फिर जैसी दुनियावी तस्वीर होती है वैसा ही करने लगते हैं।'

'दिलचस्प।' मेरे मुँह से निकला, 'बड़ी विचित्र बात है।' मैंने प्रस्ताव दिया, 'आओ चाय पीते हैं।' और उसके उत्तर के इंतजार से पहले पास की सीट पर बैठ गया।

'जरूर-जरूर!'

'कोई जल्दी तो नहीं है न?' मैं आश्वस्त होना चाहता था ताकि उनके साथ काफी वक्त बिता कर जानकारियों से वाकिफ हो लूँ।'

'बिल्कुल निश्चिंत रहें।' वह कहते-कहते मुस्काया। 'हिंदुस्तान में ...' उसने बातचीत को झटके से विराम दे डाला।...

'क्या दीखा... क्या दीखा आपको हिंदुस्तान में?'

'बस कुछ नहीं। एक लंबी फुर्सत। लोग फुर्सत में हैं। जो कुछ होगा वह पश्चिम से ही आएगा। यह अगर आप गौर करें तो एक तरह का ब्राह्मणवाद है। ब्राह्मणों ने यह व्यवस्था पहले से की हुई है। जो कुछ होगा ऊपरवाला करेगा परंतु यह कहते हुए भी वह अपनी दक्षिणा झपोर लेगा।'

'फुर्सत में और दक्षिणा ...' मैंने कहा, 'अब जजमान लोग इतने मूर्ख नहीं रह गए। सब कुछ ठोंक-बजा कर देखते हैं न?'

'भई यही है न पश्चिम का असर!' वह मुस्कुराते हुए बोला, 'वहाँ सब ठोंक-बजा कर देखते हैं। पहले गारंटी दो फिर माल लेंगे।' उसने जेब से एक छोटी-सी डिब्बी जैसी चीज निकाली, 'अब मैं सारा दफ्तर इसी डिब्बी से यहाँ से चलाता हूँ।' उसने डिब्बी खोली तो मोबाइल टेलीफोन से थोड़ा चौड़ा-सा कुछेक इंच भर मोटा सपाट-सा यंत्र निकला।

'यह क्या है?'

'बस एक यंत्र।'

'पर किस उपयोग के लिए?'

'कहा न, मैं अपना सारा दफ्तर इसी से चलाता हूँ। कहीं से भी यह मुझे सूचनाएँ देता है।'

'यहाँ, इस जगह आवाजवाली चीज का प्रचलन नहीं हो सकता। यहाँ तो हम मोबाइल का इस्तेमाल भी नहीं करते।'

'मैं यह नियम जानता हूँ। हमारे देश में यानी जहाँ मैं अब रहता हूँ कई जगह पाबंदियाँ हैं।'

'यहाँ पर कुछ पढ़ तो सकते हैं पर बोल नहीं सकते।'

'मुझे मालूम है। मालूम है।'

'...'

'पर इस यंत्र में बोलने की जरूरत नहीं पड़ती, जो कुछ बोला जा रहा हो कहीं भी वह लिख कर आ जाता है।'

'क्या मतलब?'

'यही न कि यह यंत्र बोले को लिपिबद्ध कर देता है और इसी के बाहर के मानीटर पर छाप देता है। हुआ न आसान? आप चाहें तो बस अपने हाथ के स्पर्श से या किसी भी नुकीली चीज से लिख कर वह तत्काल दूसरी पार्टी को भेज सकते हैं। फिर बोलने की जरूरत ही कहाँ पड़ी?'

'चमत्कार!'

'बस यंत्र है। मशीन का चमत्कार!'

'हर लिपि में लिखता है क्या?'

'हाँ।'

'यह तो बहुत काम की चीज है।'

'इसीलिए तो पश्चिम के लोग तरक्की कर रहे हैं। अब करोड़ों लोगों के लिए यह यंत्र सुलभ होगा। देखो न वे कितने होशियार हैं। हर बार इस यंत्र में सुधार कर हर बरस लोगों को नए यंत्र लेने के लिए मजबूर करते रहेंगे।'

'यही व्यापारिक जगत का अनैतिक काम है?'

'बस इसी बात पर तो हम मार खाते हैं।'

'पर सोचो तो भाई। एक कंपनी एक साल में इतने यंत्र पैदा करे और एक ही साल में इतने ही पुराने यंत्र कूड़ा बन जाएँ तो यंत्रों का कूड़ादान हो गई न धरती।'

'अरे इसी बात को तो आप लोग समझ नहीं रहे।' वह थोड़ा झल्लाया।

'सोचना तो पड़ेगा ही न कि ये कंपनियाँ पूरी दुनिया में कुछ बुराइयाँ भी फैला रही हैं, दुनिया को कूड़ेदान बना रही हैं।'

'बस यही बात... यही बात मुझे हिंदुस्तानियों की नहीं भाती। अरे...' वह जैसे कुछ गुस्से में आ गया था। फिर वह नरम पड़ता बोला, 'मान लेते हैं थोड़ी देर के लिए।'

'क्यों, थोड़ी देर के लिए ही क्यों? मेरी बात को पूरी तरह मानने में हर्ज क्या है?'

'हर्ज तो कोई नहीं।' उसने फिर संयम बरता। पर गुस्सा झलक रहा था।

'व्यापारिक दुनिया में पैसे कमाने के लिए कुछ भी किया जा सकता है?'

'आप कहना क्या चाहते हो?' वह थोड़ा संबोधनों में अटका।

'देखो मित्र! एक कंपनी एक यंत्र बनाती है। चलो मान लिया उस पर सारे खर्चें करती है। शोध करती है, उसे ठीक-ठाक बनाती है। उससे मुनाफा कमाती है। सवाल इतना है कि यह मुनाफा जो उसे मिला यह उन लोगों की मेहनत का है जिन्होंने काम किया, उन्हें उसने ढेरों पैसा दिया - जैसे नए उद्यमियों को प्राप्त हुआ। यह तो न्यायपूर्ण-सा लग रहा है न? पर इसी में अन्याय छिपा हुआ है। उसने, बनानेवाले ने, गौर नहीं किया वह कैसे छिपे-छिपे लूटने का आयोजन कर रहा है?'

'समझ गया।' वह कुछ सख्त हो गया, 'तुम... सॉरी! आपसे अभी कम्युनिस्ट का प्रभाव नहीं मिटा, सारी दुनिया से कम्युनिस्टों की विदाई हो गई। पर आप जैसे लोगों में अभी है...।'

'अब यह मामला दूसरी तरह का है। समतावादी जरूर बाहर हो गए पर अभी लोगों की बातों को न्यायपूर्ण ढंग से सोचनेवाले तो अमेरिका में भी हैं।'

'अमेरिका का सोच एक है। 11 सितंबर ने पूरे अमेरिका को एक कर दिया।'

'हादसे अक्सर एकजुटता ले आते हैं। फिर उसी ढर्रे पर जीवन चल पड़ता है। खैर आप अपने यंत्र की बात कर रहे थे न? इसे आप एक अटकल से जानने की कोशिश कीजिए।'

'कौन-सी अटकल?'

'यह व्यापारिक कला है। अपने उत्पाद का क्षेत्र विस्तार जरूरी है और इसके लिए एक ही नियम है कि जितने बड़े वर्ग को उल्लू बनाओ उतना अच्छा।'

'मुझे यह अटकल ठीक नहीं दीख रही।'

'ये तो केवल कल्पना कर रहा हूँ।'

'कल्पना, इसकी कल्पना भी बुरी चीज है।' उसने थोड़ा गुस्सा झलकाया।

'देखिए, सृष्टि में मनुष्य ही बुद्धि का उपयोग करनेवाला प्राणी है। हम कैसे मान लें यह असली झंझट है।'

'अपनी बुद्धि से ही तो मनुष्य आगे बढ़ रहा है।'

'आप ठीक कहते हैं। आइए दूसरी परीक्षा करें...।'

'देखिए बुद्धि का पराक्रम व्यक्तिशः फलित नहीं होता।'

'कैसे?'

'यह बुद्धि इस मस्तिष्क में है।'

'हाँ।'

'जैसे पेड़ में फल है। फल उपयोग के लिए है।'

'किसके उपयोग के लिए है, उद्यमी के लिए न?'

'आपने ठीक कहा। यहीं से परीक्षा करें। क्या पेड़ स्वयं फल खाता है?'

'नहीं।'

'तो अर्थ हुआ सृष्टि में जो भी फलदायी है वह दूसरों के लिए भी है।'

'आप बातों को उलझा रहे हैं। जो लोग अपने मस्तिष्क से कुछ रचते हैं वह उनका है। अपना। निजी। व्यक्तिगत। आप लोग जो समाजवाद के पक्षधर हैं व्यक्ति को गौण कर सब चीजों को गड़बड़ कर देते हैं। अब पश्चिमी वैज्ञानिक ने जो कुछ भी निर्मित किया है उससे समाज का, पूरी मनुष्य जाति का भला हुआ है। हुआ है न? कोई भी दृष्टांत लीजिए। इन महान आविष्कारकों ने यदि अपने मेहनताने के रूप में कुछ ले लिया तो इतना हो-हल्ला क्यों? तमाम क्रांतिकारी लोग उन महान अन्वेषकों को, उनकी परंपराओं को नष्ट करने की प्रक्रिया में विश्व के सुखद भविष्य की हत्या नहीं कर रहे हैं क्या?' वह ज्यादा आवेश में आ गया था।

'चलिए, आपकी बात मानते हैं। यह तो आप मानेंगे कि इस पृथ्वी का भी इस सारे प्रकरण में कुछ योगदान है। अगर यह पृथ्वी न होती तो क्या मनुष्य संभव था?'

'आप तो ऐसा सवाल कर रहे हैं जिसका मामले से कोई ताल्लुक नहीं है।'

'है।' मैंने जोर दे कर कहा।

'कैसे?'

'अरे भाई, यह हवा, पानी, यह वातावरण क्या यह सब कुछ आपके आविष्कारों से प्रभावित नहीं होता है?'

'होता होगा। आविष्कारक इसकी चिंता क्यों करें?'

'आखिर आविष्कार का मूल लक्ष्य क्या है?'

'मूल लक्ष्य अलग-अलग दृष्टियों से देखा जाता है?'

'कैसे?'

'एक व्यक्ति जो अपनी बुद्धि से कुछ चीजें अन्वेषित करता है वह यह बताना चाहता है कि मनुष्य मस्तिष्क यदि विकसित हो तो वह सृष्टि के रहस्यों को जान सकता है?'

'माफ करें। यहीं पर गड़बड़ है।'

'कैसी गड़बड़?'

'इस मामले में व्यक्ति यानी वह मनुष्य बड़ा हो गया।'

'क्यों न हो वह बड़ा?'

'दुनिया की सारी जनसंख्या में सिर्फ एक आदमी ही बड़ा हो...'

'इसमें हर्ज ही क्या है?'

'यही तो वह बिंदु है जहाँ से व्यक्तिपूजा शुरू होती है। व्यक्ति सीखता किससे है? निकटस्थ से, प्रकृति से, समाज से और समुदाय में वह सुरक्षित भी है।'

'बिल्कुल नहीं।'

'अब जैसे गांधी को लें?'

'गांधी के त्याग को तो देखो।'

'ऐसे हजारों त्यागी मिलेंगे दुनिया में।'

'समझो। गांधी ने अपनी पश्चिमी शिक्षा के अहंकार को त्याग कर भारत की सेवा करने का संकल्प लिया।'

'इस बात से मैं सहमत नहीं हूँ।'

'कोई कारण?'

'असल में गांधी ने भारत को प्रगति के रास्ते से सौ वर्ष पीछे धकेल दिया।'

'क्या आप इसे सिद्ध कर सकते हैं?'

'यह तो स्वयं सिद्ध है।'

'कैसे?'

'क्या दिखाई नहीं देता?'

'दुनिया में गांधी की प्रतिष्ठा देखी है क्या?'

'यह सब विज्ञापनबाजी है।'

'क्या मतलब?'

'मतलब साफ है, जो राज्य हथियाना चाहते थे उन्होंने भारतीय जनता को उल्लू बनाने का सबसे आसान तरीका समझा।'

'मैं सोचता हूँ आपको अपनी इस राय पर पुनर्विचार करना चाहिए।'

'भला क्यों? क्या यह सच्चाई नहीं है?'

'इतिहास के संदर्भ में देखें तो यही एकमात्र सच नहीं है।'

'देखिए आप लोग इसी तरह तर्क-कुतर्क के द्वारा इतिहास का हवाला दे कर उन्हीं शक्तियों का समर्थन करते हैं जो राजसत्ताओं से फायदा उठाते हैं।'

'हम अपनी मूल बातचीत में वापिस चलें तो बेहतर,' मैंने प्रस्ताव दिया।

'मूल बात यही है कि नए-नए आविष्कारों ने मनुष्य को जो नई सुविधाएँ दी हैं उनके आविष्कारकों और उत्पादकों ने जो नई दुनिया बनाई है, उस व्यवस्था का परिपूर्ण रूप से विकास होना चाहिए।'

'इसमें कोई दो राय नहीं है। व्यवस्थाएँ विकसित होती रहती हैं। परंतु मनुष्य को लूटने की दृष्टि से जिन सुविधाओं की विज्ञापन और प्रचार द्वारा बढ़ा-चढ़ा कर विज्ञप्ति की जाती है वह शोषण का नया तरीका है। पहले आदमी के श्रम पर कुछेक पूँजीपति डाका डालते थे, अब पूँजीपति घराने, कारपोरेट जगत विश्व को...'

मेरे वाक्यों से वह आहत हुआ - ऐसा मुझे महसूस हुआ, क्योंकि मेरी बात सुनते-सुनते वह यकायक खड़ा हुआ - बोला, 'आपकी और मेरी बातचीत हो ही नहीं सकती। हम दो अलग दृष्टियों से सोचनेवाले लोग हैं। आप भूल जाते हैं कि मनुष्य को मनुष्य की दासता से मुक्ति का काम पश्चिमी सत्ताओं ने किया। उसका 'क्रेडिट' तो उन्हें देना ही चाहिए।'

'बैठिए... बैठिए। बहस में उत्तेजित होना बुरा नहीं। हम आपस...'

मैं कह ही रहा था कि उसके 'इंस्ट्रूमेंट' में कोई हलचल हुई।

'एक मिनट!' उसने मुझे हाथ से बरजा।

'क्या हुआ?'

'शायद कोई संदेश हो?'

'देख लें।'

उसने थोड़ी देर अपनी डिब्बी को हिलाया। पर उस पर कोई संदेश दर्ज नहीं हुआ।

ठीक इसी बीच दो लोग आपस में जोर-जोर से बातें करते अंदर घुसे, 'सब साले लुटेरे हैं।' उनमें से एक बोल रहा था। वे भूले-से हुए थे कि इस जगह जोर-जोर से बोलना तो ग्राम्यता की निशानी थी। सब लोग जो चुपचाप बैठे हुए थे, उन्हें सर उठा कर ताकने लगे।

'छोड़ो भी यार...'

'क्यों छोड़ो?'

'हम क्या कर लेंगे?'

'क्यों, कंपनियों पर दावा तो ठोक सकते हैं?'

'अबे कितना पैसा लेंगे वकील लोग?'

'अब जब लाभ लेना है तो?'

'यह बनियों, तस्करों, लुटेरों की व्यवस्था है। इसमें लाभ की गुंजाइश कहाँ है?'

'क्यों अधिकार तो हैं। मूलभूत अधिकार।'

'यारो, अपने अधिकार... ' वह कह कर ठहाकेमार हँसी हँसा।

दोनों जन बोलते-बोलते अपनी सीटों पर बैठ गए। ऐसे बहुत कम अवसर होते थे जब उस जगह लोग जोर-जोर से बोलते और बहस करते थे। खुद को सुसंस्कृत कहाने के लिए कड़ी तपस्या जैसी बात थी।

'शिष्टाचार नामक कोई चीज रह नहीं गई है।' मेरे दोस्त ने हैरानी जताते हुए धीमे से कहा।

उसके हाथ में अब भी उसका यंत्र था, 'एक सौ लोगों के व्यवहार पर अनुशासन का शिकंजा होना चाहिए। कहाँ है भारतीय संस्कृति, शिष्टाचार।' वह भी आवेश में आ गया था।

'आजकल शिष्टाचार राजनय की वस्तु रह गया है।' मैंने विनम्रतापूर्वक बहुत धीमी आवाज में उत्तर दिया। साथ में जोड़ा, 'लोग अपनी स्वतंत्रता का उपयोग कर रहे हैं न?'

'ऐसा क्यों हो रहा है?' वह तैश में था, 'स्वतंत्रता का मतलब अराजकता नहीं है।'

'वे अपने-अपने ढंग से विश्व की बदलती स्थिति पर गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। इस तरह की दुनिया बना दी गई है... अब तो लाजिमी है... रसोईघर... विश्व का बाजार होना है।'

'कैसे?'

'अब ये दोनों जन जिस बात से त्रस्त हैं - उसका मूल केवल बाजार का पूरे जीवन में हस्तक्षेप है।'

'यह आप अटकल लगा रहे हैं।'

'आप ठीक हो सकते हैं। मैं अनुमान के सहारे आगे बढ़ रहा हूँ। अनुमान भी तो सत्य की प्राप्ति का एक साधन है।'

'देखिए हम लोग दर्शनशास्त्र की गुत्थियों में न जाएँ। परंतु आप जानते हैं कि ज्ञान की हर शाखा में अनुमान की एक जगह है।'

'चलिए। सुन लेता हूँ आपकी बात।'

'कोई उत्पाद्य जब बनता है तो उसमें बहुत-सी चीजें शामिल होती हैं।' ...अचानक बोलते हुए उसे रोक वे मेरे प्राचीन दोस्त यानी पूर्व परिचित बड़ी बेचैनी से बोले, 'सब पुरानी बातें हैं।'

'कहने तो दीजिए।'

'अरे क्या फायदा?'

'यही मूल भाव है न? हम हर चीज में फायदा देखने के आदी हो गए हैं?'

'तो आप बताइए न क्या कोई नुकसान या हानि के कोई काम शुरू करेगा?'

'चलिए इसी बिंदु से शुरू करते हैं।' मुझे बहस में मजा आ रहा था।

'करिए।'

'कोई आदमी एक कारखाना लगाता है। वह फायदे के लिए प्रतिश्रुत है। पर क्या यह फायदा एकांगी है?'

'क्यों? जो भी काम करेगा फायदा ही उसका लक्ष्य होगा न? फिर एकांगी क्या हुआ।'

'क्या उत्पाद्य से दूसरे का फायदा नहीं है?'

'मुख्य क्या है - इस पर फैसला दें आप?'

'मुख्य एक नहीं है, यही तो मैं कह रहा हूँ। यह सब एक सामुदायिकता का प्रतिफल है जो सामुदायिकता को ही संबोधित है।'

'फिर आप उलझा रहे हैं?'

'मैं यही कह रहा हूँ कि कोई भी शुरुआत, किसी भी चीज की हो... वह अपने आप में बहुमुखता लिए हुए है। हम इस सच से क्यों मुँह मोड़ना चाहते हैं?'

'आपका आधार ही गलत है।' उसने कुछ-कुछ ऊबते हुए, मेरी नासमझी पर तरस खाते हुए कहा, 'कोई चीज किसी और के उपयोग की हो या उसे भा जाय तो यह अलग-सी बात है। यह तो आप मानेंगे कि उसका ताल्लुक एकदम उत्पादित वस्तु से नहीं है। आपने कोई फर्नीचर बनाया। किसी पैसेवाले ने उसे किसी भी प्रयोजन से खरीदा हो, उसका क्या अर्थ?'

अब मेरे लिए कुछ कठिन-सा रास्ता था। उस आदमी को किसी भी कोण से समझाने में मैं असमर्थ सा महसूस कर रहा था कि अचानक उसके हाथ से मेज पर रखे यंत्र में कुछ हलचल हुई। पर फिर वह शांत हो गया। मेरे मित्र ने उसे हर कोण से पलटा पर वह निर्जीव ही रहा।

मैंने बात बदलने के लिहाज से, सारे प्रसंग को वहीं दफनाते हुए, नए ढंग से बातचीत को मोड़ने के लिए पूछा, 'आपने अपना परिवार यहीं रखा हुआ है कि वे बाहर ही रहते हैं?'

वह कुछ भड़के हुए स्वर में बोला, 'इसका कोई अर्थ हमारी बातचीत से नहीं है। क्या परिवार उत्पाद-सी चीज है? मार्क्सवाद में परिवार के लिए क्या जगह है?'

मैं हथियार डालने के लिए तैयार हो गया। मैंने घड़ी देखी। जाहिर है यह उसके लिए भी संकेत था कि बस इससे आगे बात बढ़ेगी नहीं।

'नहीं... नहीं... मेरा मतलब परिवार को वर्तमान बातचीत से जोड़ना नहीं था। मैं माफी चाहता हूँ अगर कोई ऐसा संकेत मेरी बातचीत से उभर रहा हो?'

उसने फिर यंत्र उठाया। उसे चारों तरफ से निहारा। पीछे से उसे खोला। उसकी महीन-सी काया को गहराते संदेह से देखा। वह यंत्र मुझे विचित्र लगा। दीखने पर मोबाइल जैसा, पर उसके भीतर परतों के भीतर परतें थीं जैसे गुड़िया के भीतर गुड़िया होती है।

'मैं जरा बाहर हो आऊँ। शायद यहाँ सिग्नल पकड़ने में गड़बड़ी है।'

'इस तरफ से,' मैंने बगीचे की तरफ इशारा किया।

'ओह! धन्यवाद। माफ करेंगे। बस जल्दी ही लौटा,' वह कुछ चिंतामग्न-सा दिखा। उसे किसी फौरी संदेश का इंतजार था। और यंत्र था कि कुछ सूझा ही नहीं रहा था।

अंदर बहुत-से लोग बैठे थे। एक मेज के इर्दगिर्द नामी-गिरामी पत्रकार थे। वे अपनी बहसों में निमग्न थे। एक ओर राजनीतिज्ञों का जमावड़ा था। वे भी अपनी बातों में मशगूल थे। आज की महत्वपूर्ण खबरों पर विमर्श में निमग्न। वे लोग सभी ऐसे विचारवान थे जिनके पास न सिर्फ आलोचनात्मक दृष्टि थी बल्कि वे राष्ट्रीय नीतियों को अपनी ओर मोड़ने में कुशल थे। इससे अंदाजा लग सकता है कि मेरे विदेश में निवास कर रहे मित्र क्यों वर्ष के कुछ दिन इन्हीं केंद्रों की ओर आते हैं।

'माफ करना।', वे जितनी तेजी से गए थे उतनी ही तेजी से लौटे, 'इस यंत्र में कुछ गड़बड़ है। और मुझे नहीं मालूम कि यहाँ इसका उपचार हो पाएगा। परंतु मैं थोड़ा बाहर बाजार की ओर जा कर कहीं से अपने नगर में फोन कर लेता हूँ।' उसने घड़ी देखी, 'अभी सुबह का वक्त होगा वहाँ कोई न कोई मुझे 'अटेंड' कर लेगा।'

'अगर बुरा न मानो तो मेरे इस भारतीय मोबाइल टेलीफोन को ले लो। इसमें बाहर फोन की सुविधा है।'

'व्यर्थ में आपके पैसे खर्च हो जाएँगे।'

'उसकी फिक्र न करें।' मैंने कहा, 'मुझे यह सुविधा किसी कारण मिली हुई है। कारण मैं फिर बताऊँगा पर इसका बिल कोई अन्यत्र देता है। आप बेफिक्र हो जितनी देर चाहें बाहर खड़े हो कर बातें करते रहें।'

मेरे आग्रह पर उसने फोन ले लिया। और तत्काल बाहर चला गया।

लौटा तो वे थोड़े खिन्न-से थे।

'क्या बात हुई?' मैं उत्सुक था जानने के लिए कि क्या घटा होगा?

'हाँ, बात तो हुई। पर यंत्र में जो गड़बड़ी है वह कंपनी के ही द्वारा ठीक की जाएगी। अब समझ में नहीं आ रहा, क्या करूँ?'

'सोचना क्या है? आजकल कूरियर सर्विस ऐसी है कि उन्हें यंत्र कल ही मिल जाएगा और वे ठीक कर लौटा दें तो बहुत अच्छा।'

'कुछ शर्तें बहुत कड़ी हैं। सामान्य ग्राहकों पर वह लागू नहीं होनी चाहिए।' वह बोला। उसके बोलने में क्षोभ ज्यादा था। वह बोला तो ऐसे लगा कि वह किसी अंतर्वेदना से पीड़ित हो।

मैंने उसे उबारने के लिए कहा, 'हमारे शहर में भगीरथ पैलेस और नेहरू प्लेस दो ऐसी जगहें हैं जहाँ अत्यंत प्रतिभाशाली लोग हैं। वे आपके यंत्र को यहीं दुरस्त कर देंगे। पर अब शाम हो चली है, कोई मिलेगा नहीं।'

'नहीं... संभव नहीं है। दुख यह है कि ठीक करने की जो राशि उसने बताई वह यंत्र के मूल्य से दुगुनी है।'

'यह तो एकदम चोरी और सीनाजोरी हुई।'

'ऐसी बात नहीं। मैं इन कामों की कुछ सच्चाइयाँ जानता हूँ। शायद यंत्र में जमा 'रिकार्ड' की सुरक्षा के कारण यह हो...'

'यही तो मैं कहना चाहता था। बड़ी-बड़ी कंपनियाँ अपने मुनाफे के लिए उपभोक्ताओं को उल्लू बनाने के नए-नए रूप, नए-नए कार्यक्रम बनाती चलती हैं।'

'आपकी बात सही हो सकती है। अपने इस ताजे से अनुभव से तो यही लगता है।' वह बदला हुआ आदमी लग रहा था। उसकी आवाज बहुत कोमल हो आई थी। मैंने कल्पना की कि पूँजीवाद के खिलाफ एकजुटता में यही एक स्वानुभूति से उत्पन्न विनम्रता एक नए प्रजातांत्रिक मूल्य के रूप में उभरती है।

'मैं इस बात पर फिर से बहस करना चाहता हूँ कि अपने विकास के लिए आदमी किस हद तक निजता का उपयोग कर सकता है?'

'यह बड़ा कठिन इलाका है।' मैंने स्पष्ट किया, 'न्यायविद, समाजशास्त्री सारे के सारे इस इलाके में घूमे हैं यानी उन्होंने विचार किया है पर अभी तक कुछ ऐसा फल नहीं दीखता...'

'क्या इससे कोई निष्कर्ष निकाला जा सकता है?' वह बोल ही रहा था कि तभी अचानक एक बवंडर की तरह लोगों का बड़ा हिस्सा दौड़ता-भागता इस ओर आया। लोग छिपने के लिए दरवाजों के पीछे, शौचालयों की ओर लपके। यह पल भर में हो गया। हम बैठे लोग हतप्रभ थे, क्या हुआ। दौड़ते हुए एक आदमी ने कहा, 'शायद आतंकवादी घुस आए हैं।' बाद में पता चला कि किसी के भाषण पर बिदक कर दक्षिणपंथी लोगों ने हंगामा किया और मारपीट करते हुए लोगों को दौड़ाते रहे।

'यह अराजकता है।' मैंने कहा, 'दक्षिणपंथी लोग तर्क सुनना नहीं चाहते।'

'इसमें थोड़ी रियायत भी रखनी चाहिए। अगर कोई किसी की भावना भड़का रहा हो तो उसका विरोध करना ही चाहिए। यही एक न्यायपूर्ण रास्ता है।' उसने अपना पक्ष रखा।

'प्रजातंत्र की यह खूबी है।', मैंने अपनी बात उसके पक्ष में रखी कि 'जो भी हो, उस पक्ष का आधार जरूर जानना चाहिए।'

'नहीं, सभी तंत्रों में यह छूट होनी चाहिए।'

'पर कैसे कर पाएँगे ऐसे मामलों पर ऐसी व्यवस्था?'

'कानून से।'

'कानून भी प्रजातंत्र में बहुमत से पारित होते हैं।' मैंने स्पष्ट किया, 'यह संभव नहीं है। दक्षिणपंथी लोग कभी भी मतदान के वक्त भावनात्मक रूप से किसी चीज का दोहन कर सकते हैं।'

'ऐसा तो सभी कर सकते हैं। बल्कि करते ही रहते हैं।'

'नहीं, नहीं... ऐसा आरोप हम कुछ विज्ञ लोगों पर नहीं लगा सकते।'

'क्यों इसमें क्या तर्क है? विज्ञ लोगों की अलग कोटि क्यों?'

'मैं इसे मूलनीति के विरुद्ध समझता हूँ। मेरे पास तर्क हैं।'

'क्या यह स्वातंत्र्य की रक्षा का छोटा-सा काम नहीं है जिसे बेजुबान लोग इस्तेमाल कर रहे हैं।' उसने तर्क दिया।

'वे हिंसा से प्रेरित हैं। उनका लक्ष्य एकदम कुछ और है।' मैंने दृढ़ हो कर कहा।

'पर मैं ऐसा नहीं मानता।'

'व्यक्तिशः बहुत चीजें ग्राह्य नहीं होतीं।'

मैं संक्षिप्त उत्तर दे कर सोचने लगा कि इस व्यक्ति को किस रूप में समझाऊँ कि यह उस सत्य का साक्षात कर सके जो इस बहस के मूल में है।

तभी कुछ पुलिसवाले धड़धड़ाते हुए सीधे रेस्तराँ में पहुँचे। हम लोगों की चाय बहस के बीच ही ठंडी हो चली थी। मैं दूसरी चाय के लिए बोलते-बोलते सोच भी रहा था।

'सुनिए।' एक कटी-सी आवाज में पुलिसवाला सबको संबोधित हुआ, 'कुछ उपद्रवी लोग परिसर में घुस आए हैं। आप किसी को पहचान सकते हों तो हमें उन्हें पकड़ने में सहयोग दें। कानूनी धारा के अनुसार उन्होंने ऐसे परिसर में घुसने की चेष्टा की है जहाँ केवल अधिकृत लोग ही आ सकते हैं।'

वह कुछ बोलने के लिए तैयार हुआ। पर मैंने उसे रोक दिया।

पुलिसवाले चारों तरफ आ गए। जैसे उन्होंने घेरा डाल दिया हो।

'जो लोग अधिकृत नहीं हैं वे लोग कृपया अपने हाथ खड़ा करें।'

मेरे साथवाला आदमी अधिकृत नहीं था। वह जरूर किसी का मेहमान था। इस पल वह मेरा ही मेहमान था। वह हाथ उठाने ही वाला था कि मैंने उसे फिर रोका।

वह चुपचाप मेरी तरफ देखता रहा।

थोड़ी देर बाद पुलिस के लोग चले गए। एक सज्जन खड़े हुए बोले, 'आजकल आतंकवाद का जमाना है। पुलिस को अपने कर्तव्य कर लेने चाहिए।'

'पर अनधिकृत लोगों को रोकेंगे कैसे?' एक व्यक्ति ने जो भीतर बैठा था, ने शंका व्यक्त की।' यहाँ ढेरों लोग सुस्ताते रहते हैं। राजनीतिज्ञों से मिलने के लिए ही जैसे यह चायघर बनाया गया हो।'

'सही कहते हैं आप!' किसी ने समर्थन किया।

'आजकल पहचानना मुश्किल है कि कौन असली है और कौन नकली।'

'असल में पूरे मुल्क में ही यह वातावरण है।' एक ने टिप्पणी कर दूसरे की ओर देखा। वह प्रतिपक्षी था। बोला, 'अरे, यह सब सरकारी चोंचले हैं।' वार्ता चल ही रही थी कि कुछेक पदाधिकारीगण घुसे, उनके हाथों में कुछ कागज थे।

परंतु भीतर के लोगों ने उन पर ध्यान नहीं दिया। वे सब अपने में मशगूल थे।

मेरे मेहमान ने कहा, 'मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि ऐसे माहौल में हम बड़े-बड़े सवालों के बारे में कैसे एकजुट हो पाएँगे।' मैं इस मामले में चुप ही रहा क्योंकि बड़े-बड़े सवालों पर एक राय रखना कठिन था।

'मुझे आपके फोन की दुबारा आवश्यकता पड़ सकती है। मुझे अपने एक अन्य फोन पर यह संकेत छोड़ना है कि वे मुझे आपके नंबर पर संपर्क करें। क्योंकि आपके फोन से यहाँ से नंबर मिलाने पर बहुत खर्चा निकल आता है।' उसने संकोच से कहा।

'उसकी आप परवाह न करें।'

'फिर मैं अंदर की घटना से भी क्षुब्ध हूँ।'

'हम भारत में इसे अपने ही ढंग से देखते हैं। इसे अप्राकृतिक नहीं मानते।'

'इसमें प्राकृतिक क्या है?'

'जहाँ लोग रहेंगे समस्याएँ तो रहेंगी ही।'

'यह पराजित मनोवृत्ति है।'

'हम ऐसे ही रहते हैं भाई।'

'सदियों की आदत है।'

'तभी कहता हूँ न इसे बदलना चाहिए।'

'अब हमारे लोक में। मनोचित्त में, हमारी तमाम साधनाओं में यह है। कैसे बचें इससे?'

'बस यही बात है न। मैं कतई सहमत नहीं हूँ।' वह क्षोभ में बोला, 'जो भी हो, भारत को अपने को बदलना होगा। इस अर्थ में भारतीय को भी। हमारी समूची दृष्टि में जो प्रबंधन की कमी है उसे भीतर प्रविष्ट कराना होगा।'

मैंने पाया कि वह काफी क्लिष्ट भाषा बोलने लगा था। उसने मेरा टेलीफोन अपने हाथ में ऊपर उठाया, 'पश्चिम की इस छोटी-सी चीज ने कितना क्रांतिकारी काम किया है। कभी आपने इस पर सोचा है।'

मैं सिर्फ मुस्कुरा दिया।

वह इससे कुपित-सा जान पड़ा, 'मैं जरा बाहर जा कर फोन कर आऊँ।' वह उठ कर चला गया तो मैं सोचने लगा अमेरिका में बसा एक आदमी घर लौटता है तो उसे अपने घर की दीवारें ज्यादा काली लगती हैं।

मुझे याद आया। मेरा एक सहयोगी यूरोप में कहीं नौकरी करने लगा। गाहे-बगाहे वह आता रहता था। भारत में उसे कोई नौकरी मनचाही-सी नहीं मिली थी तो उसने कोशिश कर विदेश की जुगत भिड़ा ली। वह दोस्त था तो बीच-बीच में खत लिख दिया करता था। उसके खतों में देश की यादों की सतरें भरी रहतीं। वह पहली बार आया तो मुझसे भिड़ गया। बोला, 'बड़ा पुराना देश है। खूब सुसंस्कृत। पर यूरोप के मुकाबले में हम अभी पशु हैं।'

'भला कैसे?'

'अबे न ढंग का खाना, न पहनावा। साले जो देखो धोती झटकारते आ जाता है। दक्षिण जाओ तो साले लुंगी गंजी में काला बदन उघाड़ते हैं, छी छी...।'

मैं उसकी बातों पर हँसा, 'तूने अभी गोरों की गंदगी नहीं देखी। अच्छा ही हुआ।' मैं बोला, 'पर जिस दिन तेरा सामना उस गंदगी से हो जाएगा, तू अच्छाई का तुलनात्मक रूप समझ जाएगा।'

वह मेरी बात कतई नहीं मानता। मैं जैसे भी कहता। मैंने सोचा उसे उसी के हाल पे छोड़े रहूँ। पर एक दिन तो हद हो गई। हम लोग दिल्ली के आई.टी.ओ. इलाके में मिल गए। मैं मंडी हाउस जाने के लिए तैयार था। और पैदल ही चल पड़ा था कि पीछे से वह मुझे आवाज दे कर रोकने लगा, 'रुको, रुको।' उसने मुझे कहा, 'मैं भी वहीं चल रहा हूँ।'

'तो चलो।'

'पैदल?'

'और क्या। एकदम पैदल।' मैंने उत्तर दिया।

'पर यार टैक्सी से चलें।'

'बहुत नजदीक है मंडी हाउस।'

'पर टैक्सी से चलें?'

उसकी जिद मुझे समझ नहीं आई, 'टैक्सी शायद ही मिले।'

'क्यों?'

'इतनी नजदीक जाने के लिए कोई तैयार न होगा।' मैंने उसे समझाने के लहजे से कहा।

'तभी हमारा मुल्क तरक्की नहीं कर रहा।' उसने उत्तर दिया।

'ऐसा करते हैं टैक्सी स्टैंड यहीं पास है कोटला के पास। वहाँ चले चलते हैं। फिर टैक्सी से जल्दी पहुँच जाएँगे।'

'परंतु प्यारे, वहाँ उतनी दूर पीछे जाने के बजाय हम आगे चलें तो अगले छह मिनट में मंडी हाउस पहुँच जाएँगे।'

'अबे यार, आदमी की टाँग और पहिए का घुमाव, उनका कोई मुकाबला नहीं। जब से चक्के की ईजाद हुई है तब से उसे तेजी के फंदे में ज्यादा से ज्यादा तेज कर रहे हैं।'

मैं उसके तर्क से सहमत नहीं था। पर पीछे जाने के लिए उसके साथ हो लिया।

हम टैक्सी स्टैंड पहुँचे तो इस बात से निराश थे कि कोई टैक्सी तो वहाँ है ही नहीं? अब... अब क्या किया जाय यह सोच ही रहे थे कि एक लाल-पीली टैक्सी स्टैंड पर आ लगी।

'चलो भई।' मेरे दोस्त ने कहा।

'कहाँ साहब?'

'मंडी हाउस!'

'खाली नहीं साहब।'

'जितने पैसे चाहे ले लो।'

'खाली नहीं साहेब।' उसने हुड उठा कर गाड़ी की जाँच करनी शुरू की थी कि मेरा दोस्त बैचेन हो उठा। वह सीधे टैक्सी के पास गया।

'तुम ना नहीं कह सकते।' मेरे दोस्त ने जोर दे कर कहा, 'मैं तुम्हारी रिपोर्ट करूँगा।'

'ओय जो करना है जल्दी कर!'

'तमीज से तो बात करो।'

'ओय लो देखो मैंने कौन-सी बदतमीजी की।' वह गरजा और आव देखा न ताव उसने अपनी गाड़ी से एक गोल डंडा बाहर निकाला।

मैं समझ गया वह लड़ने के लिए तैयार है, 'जा साले जहाँ अपने बाप को रिपोर्ट करने जाना हो...' और वह डंडा उठाए मेरे दोस्त के सामने खड़ा हो गया।

'क्या करोगे तुम?'

'साले रिपोर्ट से पहले तुम्हारी खोपड़ी न फोड़ दी तो बात ही क्या।'

मैं लपक कर अपने दोस्त के करीब चला गया। कुछेक तमाशबीन और जुट आए थे। वह सरदार लाठी ले कर खड़ा तो ऐसा था कि किसी भी पल प्रहार कर दे। पर वह थोड़ा गुस्से के कारण आवेश में था।

'रिपोर्ट तो मैं तुम्हारी करूँगा ही।' मेरे दोस्त ने कहा, और पीछे मुड़ कर मेरी ओर चला आया कि तभी तेजी से सरदार लाठी ऊँची किए पीछे से चिल्लाया, 'ओय हिम्मत है तो एक बार फिर बोल।' इतने में पास खड़े दूसरे टैक्सी ड्राइवरों ने उसे रोका। एक ने उससे डंडा खींच लिया। वह चिल्लाने लगा कि दूसरे ने उसे अपनी भुजाओं में जकड़ लिया।

'पागल हो गया है क्या? देखता नहीं 'फारेन' की सवारी है?'

'मैं क्यों देखूँ। कोई उसके बाप का नौकर हूँ। जब मर्जी होगी चलूँगा।'

'बस कर।' एक सीनियर ने डाँटा, और हमारी ओर संकेत कर कहा, 'टैक्सी सड़क पर मिल जाएगी सर, यहाँ असल में नंबर का कोई चक्कर है इसीलिए यहाँ से सवारी नहीं लेते।' उसने सफाई दी।

हम तुरंत सड़क की ओर निकले।

एक गाड़ी खाली जा रही थी। उसे रुकने का इशारा किया तो वह दूर जा कर रुकी।

'मंडी हाउस!' मेरा दोस्त बोला।

'बैठो जी।' उसने दरवाजा खोला।

'मीटर डाउन कर लो।'

'मीटर तो खराब है सर।'

'तो पैसे कैसे लोगे?'

'आप जो देंगे वही काफी होंगे सर...'

हम लोग शायद चार मिनट में ही मंडी हाउस पहुँच गए थे। टैक्सीवाला यह भी झगड़ालू था, पैसे के लिए हुज्जत करने लगा। मेरे दोस्त ने न सिर्फ बढ़े हुए पैसे दिए ऊपर से उसे कुछ टिप भी दे डाली।

यह सिर्फ दृष्टांत है कि हम पर बाहर से आने का एक अदृश्य-सा सांस्कृतिक दबाव रहता है जो पैसे से जुड़ा रहता है और हम उसका उपयोग गाहे-बगाहे मुल्क की दयनीयता से जोड़ते कर देते हैं। ठीक यही भाव उन तमाम लोगों का है जो लंबे अरसे बाद भारत आते हैं। बीच के वर्षों के संघर्ष और राजनैतिक कुचक्रों की जानकारी के अभाव में पश्चिम की चमक-दमक की तुलना करने लगते हैं और अपने उस अभाव के बारे में अनजान पैसे से ही सब कामों के निष्पादन का मूलमंत्र प्रचारित करने लगते हैं।

वह मेरा परिचित जो टेलीफोन करने बाहर गया था लौट आया। कुछ संतुष्ट-सा वह बोला, 'घर-दफ्तर बातें तो हो गई हैं, पर मेरे यंत्र के ठीक होने के आसार नहीं है?'

'भारत में बहुत कुशल कारीगर रहते हैं। कहीं जा कर टेलीफोन यंत्र सुधारनेवाले को दिखा। वह पलभर में ठीक कर देगा। दिल्ली में तो अकेले गफ्फार मार्केट में असंख्य विशेषज्ञ मिल जाएँगे। वह तो चाँदनी चौक और भगीरथ पैलेस को भी मात दे रहा है। बस जेब बचा कर रखना।'

मेरी सलाह पर वह सिर्फ हँसा।

'जेब बचा कर...' उसने मेरी बात दुहराई, 'ऐसा क्यों बना हुआ है भारत में?'

'गरीबी के कारण। मोटे तौर पर मुझे लगता है हमारे देश में जनता ज्यादा है काम कम है। फिर शिक्षा... यानी सभी जगहों पर कुछ न कुछ अभाव है।'

'परंतु यह सब कर्णधारों की हरकतें हैं। हर काम के लिए रिश्वत?' वह बोलते-बोलते चुप लगा गया।

'यह तो आप ठीक कह रहे हैं।' मैंने उसका समर्थन किया। और ताजा चाय का कप उसकी तरफ बढ़ा दिया। पर मैंने फिर जोड़ा, 'जैसा आप कह रहे हैं, इन सब बातों के कुछ और कारण हैं। मैं शुरू से उन्हीं की तरफ इशारा कर रहा हूँ। हम लोग अगर असली समस्या की ओर देखें तो...।'

'एक मायने में तो सुलझी लग रही हैं कि वहाँ सड़कें हैं, कामकाज में काफी खुलापन है परंतु बेकार वहाँ न हों। विषमता वहाँ न हो... इस पर राजी होना मुश्किल है।'

उसने अपनी घड़ी देखी। मुझे लगा वो मेरी बातों को बेकार समझ अब चुपा गया है। मैंने बातों को मोड़ देने के लिए उससे पूछा, 'आप कितने दिन और हैं दिल्ली में?'

'कहने के लिए तो मैं पंद्रह दिन की तफरीह पर आया था। पर अब लगता है जल्दी ही लौटना पड़ेगा।'

'ठहरे कहाँ हैं?'

उसने जोरबाग के एक गेस्ट हाउस का नाम लिया, 'मैंने वहीं से बुक करा लिया था। अच्छा साफ-सुथरा है।'

'यहाँ से बहुत नजदीक है।'

'हाँ, इसी से तकलीफ भी होती है। कोई सवारी नहीं मिलती।'

मुझे वर्षों पहले का वह किस्सा याद आ गया जब हम आई.टी.ओ. से मंडी हाउस जाने के लिए टैक्सी से पहुँचे थे। मैं मन ही मन सोचने लगा, यह क्या पैसों के आधिक्य से पैदा हुई स्थिति है या एक मानसिकता। मैं सोच ही रहा था कि वह बोला, 'जोरबाग से टैक्सी तो कभी नहीं मिल पाती। कई दफे तो टैक्सी खोजते-खोजते मैं इस जगह तक पहुँचता हूँ। लौटते वक्त भी करीब-करीब यही होता है। बस मेरी चिंता तो यही है कि हिंदुस्तान कब तरक्की करेगा?'

उसके वाक्य समाप्त करते ही मेरे चेहरे पर हँसी की परत छा गई। बाहर से आनेवाले लोगों की निगाह और चिंता भारत की तरक्की पर अटकी हुई है।

'हिंदुस्तान तो तरक्की कर ही रहा है।' मैंने कहा।

'खाक।' वह बोला।

'अब आप देखो कितने पढ़े-लिखे लोग यहाँ पैदा हो रहे हैं। और सब अमेरिका और दूसरे देशों को जा रहे हैं। वहाँ नाम कमा रहे हैं।'

'वहीं उन्हें तमाम सुविधाएँ मिल रही हैं न?' वह बोला, 'वहीं उन्हें सब कुछ मिल रहा है।'

'वो लोग दूसरे गैर मुल्कों की मिल्कियत बढ़ाने में लगे हैं यह बात तो गौर करने लायक है।'

हम लोग अपनी बहस में घूम-फिर कर उन्हीं बिंदुओं पर आ जाते थे, जिनसे हमारे सैद्धान्तिक किस्म के आग्रह हमें एकपक्षीय बना देते थे। ऐसे में कठिन था कि मैं उसे अपनी तरफ कर पाता। बस उसका यंत्र ही ऐसा पक्ष था जहाँ वह कुछ टूटता-सा नजर आता था। मैं बातचीत में उसकी हताशा और पश्चिम की अकर्मण्यता या पैसा ज्यादा बटोरने की प्रवृत्ति पर सब कुछ केंद्रित करना चाहता था।

'आप गफ्फार मार्किट जाएँ तो आपका यंत्र ठीक हो जाएगा, जरूरी काम भी निपट आएँगे।'

'यह आप ठीक सुझा रहे हैं।' उसने मेरी बात का समर्थन किया, 'शायद किसी के पास इस यंत्र का मैनुअल भी हो। क्योंकि मैं मैनुअल वहीं छोड़ आया हूँ।'

'मैनुअल खरीद सकते हैं यहाँ।'

'शायद ही मिले खरीदने के लिए।'

'कोशिश कर देखिए।'

'मैनुअल भी उतने ही छापते हैं जितने इन्स्ट्रूमेंट होते हैं। खुदरा तो बेचते ही नहीं है।'

'कापी कर डालिए...'

'न... न... यह अनैतिक बात है।'

'पर यह भी अनैतिक है न कि उत्पाद्य पर इतना अधिक नियंत्रण रखा जाय।'

'यह नई दुनिया की नियमबद्धता है।'

'अगर इससे हम व्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्ष जोड़ें तो क्या ऐसा नहीं लगेगा कि ऐसी नियमबद्धता में कुछ टूटता रहता है।'

'असल में इतने गहरे में तो सभी चीजों की स्थिति हमें मानव विरोधी लगेगी। अब हम काफी आगे चले गए हैं। आखिर दुनिया का जो नया रूप बन रहा है उसी की संगति में सब कुछ देखना पड़ेगा न?'

हम दोनों अंत में मसलों को शांतिपूर्ण सुलझाने के अंतरसृष्टि सिद्धांत की आड़ में विदा हो रहे थे।

'तो कल मिलेंगे।'

'मैं सोचता हूँ आपको वक्त हो तो कल टैक्सी ले कर करोल बाग गफ्फार मार्केट चले चलेंगे। अगर यह यहाँ न ठीक हुआ तो मुझे ही लौटना पड़ेगा।'

हम लोग विदा हुए और अपनी-अपनी दिशाओं को चल दिए।

सड़कें कारों से भरी थीं। कोई खिसके तो पीछेवाला आगे बढ़े। लगभग सभी कारों में जोरदार स्पर्धा थी कि कौन कितना ज्यादा शोर करे। प्रजातंत्र में आजादी है।...

मैं पैदल ही दूसरी दिशा यानी अपने घर की तरफ चला। वह भी डग बढ़ाता हुआ। परंतु वह मेरा परिचित ठंडे कदमों से चल कुछ दूर पर खड़ा हो गया। मैं लौटा। यह सोच कि कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं। मैंने लाल बत्ती होते ही सड़क पार की।

'क्या हुआ?' मैंने जिज्ञासा और चिंता में पूछा, 'क्या कोई परेशानी तो नहीं?'

उसने सिर हिलाया, 'नहीं, कुछ नहीं।' उसने कुछ देर रुकने के बाद जवाब दिया।

'मैं लौटा, सोचा कुछ परेशानी तो नहीं,' मैंने अपना वाक्य दुहराया।

'सवारी के लिए सोच रहा था?' उसने मेरे पिछले अनुभव की फिर से याद दिला दी। इस इलाके के टैक्सीवाले कुछ ज्यादा ही हजरत थे। कहीं किसी लफड़े में न फँस जाय, मैंने सुझाया, 'यह रहा आपका गेस्ट हाउस दो कदम पर। पैदल निकल जाइए न?'

'जल्दी पहुँचने की सोच रहा था।' उसने अपनी मजबूरी का तर्क दिया।

'पर जितनी देर तक टैक्सी न मिली उतनी देर तक तो आप तीन बार लौट कर आ सकते हैं,' मैंने उसे प्रेरित करने का विचार किया।

वह फिर भी खड़ा रहा। तभी दो नौजवान करीब-करीब झगड़ते-से वहाँ से गुजरे।

'दोनों ने पी हुई है।' मेरे दोस्त ने कहा, 'यही भारत की गंदगी है। पी कर सड़कों पर हंगामा करो।'

'इसीलिए तो मैं कह रहा था आप जल्दी यहाँ से चले जाओ। आजकल कुछ हालत ऐसे हैं कि किसी के साथ भी कुछ हो सकता है।'

'पर कल जरूर मिलेंगे। ठीक यहीं सेंटर में। दुपहर में।' वह अपनी दिशा में तेजी से अपने कदम बढ़ाता बढ़ा। और मैं अपनी दिशा में।

वह तो अचानक रात में ही उसका मुझे फोन आया कि उसका यंत्र काम करने लगा है। मैंने उसे बधाई दी। मैं भी हैरान था कि यह कैसे हुआ। पर रात में ज्यादा बात की गुंजाइश नहीं थी।

तय समय के मुताबिक हम लोगों ने दुपहर के खाने पर मिलने की योजना बनाई थी। उसे वैसे ही रहने दिया। और मिलने के लिए इकट्ठे होने की बात दुहरा डाली, अक्सर ऐसा होता ही है। प्रयोजन पीछे रह जाते हैं कुछ और चीजें आगे आ जाती हैं।

इस बीच मैं उसके बारे में याद करने लगा। वह हमारे एक चित्रकार का मित्र था। वह हम सबका मित्र बन गया था। अब अमेरिका में सुसंपन्न था।

दुपहर में वह बाहर ही मेरा इंतजार कर रहा था। तय समय पर ही हम मिले।

मिलते ही मैंने कहा, 'चलो अच्छा हुआ यंत्र ठीक हो गया।'

'खाक।' वह बोला, 'बस रात में थोड़ी देर न जाने क्यों ठीक हो गया? बाद में फिर वही हाल।'

'बैटरी वगैरह परख की थी।'

'सब कुछ। बस मैनुअल हाथ में न होने के कारण ज्यादा गड़बड़ का पता नहीं चला।'

'चलो गफ्फार मार्केट चलते हैं। वहाँ बड़े-बड़े तकनीकी दिमाग हैं। हैं तो ज्यादातर अनपढ़ पर इलैक्ट्रोनिक चीजों के गहरे जानकार।'

हम लोग टैक्सी से ही गए। पर टैक्सी बहुत दूर जा कर रुकी। आगे एक तरफ ही चल सकते थे। उस एक तरफ भी इतनी भीड़ थी कि हम लोग लोगों के धक्के बचाते फिर भी धीरे-धीरे चल रहे थे। आखिर में उस इलाके में पहुँचे जहाँ गलियों में छोटी-छोटी करीने से सजी दुकानें थीं।

एक जगह दो युवक भीतर अपनी दुकान में खड़े थे, 'क्या यह नया टेलीफोन-कंप्यूटर यहाँ ठीक हो सकता है?'

दोनों युवकों ने उसे बारी-बारी देखा। उसकी बैटरी की पड़ताल की, फिर बोले, 'चार दुकानें छोड़ कर पाँचवीं दुकान में जाएँ, वहाँ शायद इसे ठीक करनेवाला मिल जाय?'

हम पाँचवीं दुकान पर गए।

'साहब, यह छोड़ना पड़ेगा।' मैकेनिक ने कहा।

'नहीं।'

उसने उलट-पुलट कर देखने के बाद वापिस कर दिया। और अपने काम में लग गया।

'घंटे - आधे घंटे में ठीक कर दो। हम यहीं खड़े रहेंगे।'

'नहीं साहब, इसका मैनुअल होता तो मैं अभी खोल देता। इसके फंक्शन देख कर मैं इसका मैनुअल बनाऊँगा तब काम शुरू करूँगा। आपको छोड़ने में क्या एतराज है?' उसने सीधे सवाल दागा।

'भई, इसमें इतनी जानकारियाँ हैं कि किसी के हाथ लग गईं तो मेरे लिए मुसीबतें खड़ी हो जाएँगी।' मेरे मित्र ने चिंता और आशंका व्यक्त करते हुए कहा।

'मैं वो खोलूँगा ही नहीं।'

'नहीं। नहीं। हम यही खड़े रहेंगे।'

'आप खड़े रहोगे तो मैं काम नहीं कर पाऊँगा।'

'हम थोड़ी देर में आ जाते हैं।'

'फिर एक-डेढ घंटे बाद आना।'

मुझे बीच में बोलने की जरूरत हुई, 'इसकी बात का यकीन कर लेते हैं।'

बहुत हील-हुज्जत के बाद एक घंटे में लौटने की बात तय हुई। परंतु पाँच मिनट बाद ही मेरे मित्र ने बेचैनी दिखानी शुरू की, 'क्यों न आसपास की दुकानों में बैठें...' उसने कहा।

'पर यहाँ इतनी छोटी दुकानें हैं, कहीं बैठने की जगह नहीं है।'

वह अशांत लगा तो मैंने सुझाया, 'कहीं चल कर खा-पी लेते हैं।' वह बहुत ना-नुकर के बाद तैयार हुआ। पर उसकी बैचेनी बरकरार रही और वह किसी दूसरी चीज में दिलचस्पी न ले पाया।

हम थोड़ी ही देर में फिर उस दुकान में थे।

तब तक मैकेनिक ने एक बड़े कागज पर तीन-चार चित्र बनाए हुए थे। और गहराई से उन्हें देख रहा था। साथ में कुछेक छोटे-छोटे बिंदु भी बनाए हुए थे।

हमें वहाँ देख कर वह मुस्कुराया, 'थोड़ा-बहुत पता तो चल गया।' वह बोला।

'तो ठीक हो जाएगा?'

'सेंट परसेंट' उसने नीचे झुके उत्तर दिया, 'पर आप लोग मुझे डिस्टर्ब न करें। मैं कुछ ही देर में आपको बुला लूँगा। आप 'रोशन दी कुल्फी' में बैठ जाएँ।' उसने खाने-पीने की, बैठने की जगह सुझा दी और उसने हमारी ओर सिर उठा कर भी नहीं देखा। वह अपने काम में तन्मय था।

हम उठ कर 'रोशन दी कुल्फी' में आ गए। वहाँ काफी भीड़ थी। पर हमें बैठने की जगह मिल ही गई। लोग बहुत इत्मीनान से बैठे हुए थे।

'पंजाबियों में यह खूबी है।' उसने कहा, 'अपने जीवन में कोई कमी नहीं आने देते। देखो मंदिर की बिल्कुल बगल में खाने-पीने का इंतजाम किया हुआ है।' मेरे दोस्त ने मुझे बगल की ही गली में उस मंदिर की तरफ देखने को प्रेरित किया जो रेस्तराँ वाली गली में ही था और खिड़की से दिखाई दे रहा था।

'तुमने... आपने कुछ देखा?' उसने कुछ सहमी-सी आवाज में अपनी बात जारी की...

'नहीं तो।'

'देखा ही नहीं?'

'मैं उधर ही देख रहा हूँ। कुछ नजर तो आया नहीं। काफी देर से खिड़की के बाहर कोई हलचल मुझे नहीं दिखाई दी।'

'अचरज है?'

'क्या था वहाँ?' मैंने पूछा।

'क्या बताऊँ?' उसने हताशा में कहा।

'बताओ न! '

'अभी तो वहीं था दृश्य और अब...'

'कोई धोखा हुआ होगा।'

'नहीं। वही था। वही दृश्य... वह कुछ उत्तेजित-सा था।'

'था क्या?'

'कुछ नहीं...' लेकिन यह कहते हुए लगता था जैसे वह ज्यादा बेचैन हो रहा हो।

'बताओ न।'

'कुछ नहीं।'

'पर इतने बेचैन क्यों हो?' मैंने जोर दे कर पूछा।

जो बात सामने आई वह अकल्पनीय थी। उसने कहा कि एक लाठी टेकती औरत फर्राटे से रूसी बोलती हुई उसे सामने के मंदिर में जल चढ़ाती हुई दीखी। यह चकित करनेवाला ही मामला था। मैं चुप रहा। मैं सीट की दूसरी तरफ बैठा हुआ था। नजारा तो मुझे भी दिखाई देता था पर उतना साफ नहीं। अब वह औरत तो वहाँ नहीं थी। मुझे बहुत सी मिली-जुली आवाजों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं सुनाई दे रहा था।

'पर आपको भाषा कैसे सुनाई दी?' मैंने उससे पूछा क्योंकि कुछ सुना तो मैंने जरूर था पर वह क्या आवाजें थीं मुझे मालूम नहीं था।

'मैंने एक औरत देखी। हाथों में बिल्कुल मेरे जैसा यंत्र था। बिल्कुल मेरे जैसा।'

'नामुमकिन।'

'अरे सच कह रहा हूँ। तुम मुझे पागल समझोगे। पर मैंने देखा। वह ठीक वैसे ही इस्तेमाल कर रही थी जैसे मैं।'

'तुम ज्यादा ही अपने यंत्र के प्रति संवेदनशील हो। अरे वह कोई मोबाइल होगा। अब सब मोबाइल आकृति में तो एक ही जैसे हैं। यह खा-पी लो।' मैंने मेज पर पड़ी खाद्य सामग्री की तरफ इशारा किया, 'फिर हम मैकेनिक के पास चले चलेंगे।'

'पर वह गई कहाँ? कहाँ लुप्त हो गई?'

'यार, क्यों न हम लोग मैकेनिक के पास चलें। उसी से कहीं यंत्र ठीक हो गया हो और उस औरत ने ले लिया तो।' वह अब बोलते हुए काँप भी रहा था।... उसकी हालत मुझे विचित्र लग रही थी।

'तुम्हारा यंत्र है, तुम चाहे जब ले लो।' मैं कह ही रहा था कि वह खिड़की की तरफ इशारा कर बोला, 'देखो वो रही औरत।'

हमारी बातचीत की वजह से दूसरों की आँखें भी उस दिशा की ओर मुड़ीं। लोग अपनी मेजों के गिर्द बैठे हमारी तरफ आकर्षित-से हुए।

मैंने भरपूर खुली आँखों से उसे देखा। वह एक मामूली घरेलू औरत थी। उसके एक हाथ में गंगाजली थी तो दूसरे हाथ में मोबाइल जैसा यंत्र।

'अरे भाई, वह कोई और मोबाइल होगा।'

'नहीं। तुम उसके हाथ में देख सकते हो कि वह उसकी हथेलियों से बड़ा है।'

'वह औरत की हथेली है न? कुछ न कुछ फर्क तो होगा।' मैंने विनोदपूर्वक हँसते हुए कहा।

'पहले मैंने भी यही सोचा था। पर मुझे पूरा यकीन है कि वह दौड़ कर मैकेनिक से ले आई होगी।'

'तो जल्दी यह व्यंजन खत्म करो। चलते हैं वहीं।'

मैंने कहा, 'पर याद रहे उसने हमें एक घंटे बाद बुलाया है।' तब भी उस मित्र की बेचैनी छिपी न रही। उसने जैसे-तैसे प्लेट की सामग्री निगली और खड़ा हो गया।

'रोशन दी कुल्फी' से निकल पहले हम मंदिर की गली में घुसे। मंदिर का एक दरवाजा मुख्य सड़क की ओर भी था। पर वह बंद रहता था। गली की इस तरफ के दरवाजे से निकल कर आसानी से दूसरी गली में दूसरी तरफ के दरवाजे से निकला जा सकता था। इस वक्त मंदिर में औरतों की भीड़ थी। पंडितजन औरतों में ही व्यस्त थे।

'हमारा धर्म औरतों के सहारे ही चल रहा है।' मेरे दोस्त ने टिप्पणी की... 'उन्हें जब फुर्सत मिलती है वे चली आती हैं।' कह तो वह गया पर सामान्य नहीं हो पाया। वह उसी औरत को खोज रहा था।

तमाम औरतों की तरफ देखने के बाद वह बोला, 'न जाने कहाँ चली गई। चलो...' उसने हड़बड़ी दिखाई, 'मैकेनिक के पास चलते हैं। कहीं वहीं पहुँच गई हो। मेरा तो भंडाफोड़ हो जाएगा।'

'मैं कुछ समझा नहीं।'

'यह समझना सचमुच कठिन है।' वह बोला, 'असल में हम लोग अमेरिका में ज्यादा ही शक्की हो रहे हैं। कोई नहीं चाहता उसका सीक्रेट दूसरा ले उड़े।' उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे लिए मंदिर के बाहर दूसरी गली से बाहर निकल आया।

'यह गलत गली है।' मैंने कहा।

हम एक बार फिर मंदिर के भीतर घुसे और दूसरी गली में आ गए। गली में ही एक मोबाइल टेलीफोनों की दुकान थी। वहाँ ठीक मेरे मित्र के यंत्र जैसा एक यंत्र लटक रहा था।

'रुको तो।' उसने मुझे रोका, 'देखो मेरे जैसा यंत्र। क्यों भाई यह क्या है?'

'यह मल्टीपर्पज मोबाइल है। ब्लैक बरीज से आगे। कंप्यूटर की अब जरूरत नहीं रहेगी।'

मेरे मित्र ने यंत्र हाथ में लिया, 'एकदम मेरे जैसा है। कीमत?'

'बहुत ज्यादा नहीं है - असली तीनेक हजार डालर में अमेरिका में और यूरोप में मिलता है। मेरावाला तो ब्लैकबरीज से भी सस्ता है। अठारह हजार का है।'

'अठारह हजार।' मेरे मुँह से निकला। बहुत महँगा।

'सस्ता है।' मेरे मित्र ने मेरे अचरज को देखते हुए कहा, 'ये ठीक कह रहे हैं सामान्यतः ब्लैकबरीज न्यू जनरेशन तीन हजार अमेरिकी डालर का है। लगभग डेढ़ लाख रुपए हिंदुस्तानी में...।' मेरे मित्र ने यंत्र हाथ में पकड़ा हुआ था और बहुत प्रमुदित हो कर उसे देख रहा था। उसकी छवि थोड़ी देर की चिंतामग्न छवि से एकदम भिन्न थी। वह अपने यंत्र के बारे में जैसे भूल-सा गया था।

'पसंद आया, सर? कुछ कम कर दूँगा अपने कमीशन में से। मेरे पास दो फोन हैं। बहुत दिक्कत से मिले हैं।'

'दिक्कत से क्यों?'

'असल में ये नकली हैं।'

'क्या मतलब?'

'अजी यहीं-कहीं एसेंबल हुए हैं।'

'यहीं कहीं?'

'हाँ!'

'जानते हो इसके लिए कैसी टेक्नालाजी चाहिए?'

'जानता हूँ सर। हमारे यहाँ ऐसी खोपड़ियाँ हैं जो आदमी की भीतरी दुनिया का डुप्लीकेट बना डालें।'

'कैसे, कैसे?' उसने व्यग्र हो पूछा।

'सर, क्या बताऊँ। मैं उतना पढ़ा-लिखा नहीं हूँ।'

'क्या कहा तुम्हें... तुमने कुछ भी इस बेतार के यंत्र के बारे में शिक्षा नहीं पाई?'

'नहीं सर, मैं तो यहीं मार्केट में पहले थैले बेचने का काम करता था। पुलिसवालों ने पहले पकड़ा फिर रिश्वत ली और छोड़ दिया। तब से धंधा बदल दिया है। अब यही करता हूँ।'

'तो यह काम कैसे कर रहे हो?'

'बस सीख गया। मोबाइल से खेलते-खेलते ही सीख गया।'

'आश्चर्य है। अरे भाई कुछ तो तुम्हें आता होगा?'

'यह खोपड़ी है न सर।' उसने अपने सिर को अपने बाएँ हाथ की मुट्ठी से बजाया। यह कूड़ा इसी में भरा है।'

'तुम्हें इसके नाम वगैरह भी आते हैं?'

'नहीं साहब। मैंने कुछ दिन पहले एक सर्किट बनाया था। मैं उसे अपने मानीटर पर फिट कर देता हूँ और उसकी फोटो प्रिंट अपने पास रख लेता था। वे आखर मुझे समझ ही नहीं आते थे। मैं रखता इसलिए था कि वायस का चित्र में जो ट्रांसफर हो रहा है यह ठीक है या नहीं... पर सर, एक नए मोबाइल के रिकार्डों में मुझे अंक गणित के आँकड़े भी मिले। तब तक सर यह नया माडल आ गया। बाजार में इसके बड़े दाम थे। मैंने तय किया बेटा महँगे से ही चिपकना ठीक है। मजदूरी ज्यादा मिलेगी।' वह हँसने लगा।

उसका बोलना रुक नहीं रहा था। मैंने अपने दोस्त को कुहनी मारी तो चित्रलिखित-सा ठिठका हुआ वह मेरी तरफ देख मुस्कुराया।

'वंडर ...' वह बोला, 'वाकई कमाल है।' उसने जोड़ा।

'किस बात का कमाल! क्या वंडर?' मैंने सवाल दागा।

'अरे भाई, एक अनपढ़ आदमी एलिक्ट्रिल सर्किट की मूल बातें जान रहा है। क्या यह कम कमाल है। हाँ, बोलो कितना दाम लोगे?'

'साब, अट्ठाइस हजार से कम तो नहीं। पर आप अगर इस डुप्लीकेट का भी डुप्लीकेट देखना चाहें तो मैं पाँच मिनट में ला सकता हूँ।' उसने कहते-कहते अपने मोबाइल पर एक अंक पर दबाव दिया कि तत्काल उसे नंबर मिल गया, 'बरींदर ओय मैं जरा गाहकों में फँसा हूँ तू एक जुड़वाँ भाई भेज दे।'

'क्या मतलब?' मैं चौंक गया, 'डुप्लीकेट का भी डुप्लीकेट?'

'अभी पंज मिंटा में आया साब। वो बरींदर से मँगा लिया न मैंने जुड़वाँ भाई...' वह बोल कर अपने हाथ में लिए यंत्र को हिलाने-डुलाने लगा।

'हमें तो जल्दी कहीं जाना है। पहले पता होता तो तुम्हारे पास आते। ऐसा एक मल्टीपर्पज मोबाइल थोड़ा खराब हो गया था। उसी के रिपेयर के लिए आए थे।'

'ओय-साब जी यहाँ तो ऐसे कारीगर हैं कि नासा और सिलीकोन भैलीवाले अपने आप को भूल जाएँ...।'

वह बात कर ही रहा था कि दौड़ कर एक नौजवान आया और उसे वैसा ही मोबाइल थमा गया। मैंने गौर किया कि मेरे मित्र की आँखें चमक गईं।

'ये सस्ता है सर, एकदम सस्ता। त्वाडे वास्ते बस छे हजार रुपए का। पर गारंटी कोई नहीं इसकी।'

'क्रेडिट कार्ड से लोगे?' उससे मेरे मित्र ने पूछा।

'ना सर। मैं नकद लेता हूँ।'

'दुनिया भर में क्रेडिट कार्ड चलते हैं।'

'मेरे बिजनेस में क्रेडिट का कोई सवाल ही नहीं सर। इधर आपने दिए उधर मैंने डुप्लीकेट बनानेवाले को दिए।'

'पर हर वक्त तो आदमी पैसा ले कर नहीं चलता।'

'जब आप ले आओ सर, माल कहीं भागे थोड़े ही जाता है। अगर मिलेगा तो दाम देने पर आपका।'

'थोड़ी देर में आ जाएँ?'

'ठीक।' और वह बोल कर अपने काम में लग गया। फिर उसने हमारी तरफ देखा भी नहीं। हम लोग वहाँ से किसी ऐसी युक्ति की तलाश में थे कि मेरे मित्र का काम हो जाय और वह अपना उपकरण ले ले।

'यह एकदम मेरे जैसे यंत्र का डुप्लीकेट है।' मेरे मित्र ने कहा, 'और अचरज है कि एक अनपढ़ व्यक्ति हार्डवेयर के उस जंजाल भरे संसार की गुत्थियाँ जानता है। मैं सचमुच हैरान हूँ। बल्कि कहूँगा कि भारतीयों को आप ई-साक्षर कर दें तो वे दुनिया में क्रांति ला देंगे।'

'ऐसे लोग अभ्यास से तैयार होते हैं। उन्हें कुछ बेसिक बातें बता दो वे अभ्यास और प्रयोग से कुछ भी कर लेंगे। ऐसे लोग देश में भरे पड़े हैं।' मैंने स्पष्ट किया।

'जो भी हो।' उसने कहा, 'यहाँ एटीएम नहीं होगा?' हम चल ही रहे थे कि हमें एक जगह एटीएम मिल गया।

'अपना पुराना यंत्र तो ले लो।'

'वह तो ले लेंगे। मैं सोचता हूँ एक डुप्लीकेट भी खरीद डालूँ। मैं इस भारतीय चमत्कार का लाभ उठाना चाहता हूँ।'

वह एटीएम के अंदर घुसा। वहाँ सीमा पंद्रह हजार रुपए की थी। उसने दो क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल किए और चुटकी बजाते ही उसके हाथों में तीस हजार रुपए आ थमे थे।

'चलो जल्दी से गली में चलो।' वह मुझे खींच कर ले गया।

'क्या अपना यंत्र पहले न लोगे।...' मैंने जोर दिया, 'अभी कुछ देर पहले तो आप उसे ले कर बेहद बेचैन थे।'

'अब इस बात को समझो। जब एक मामूली आदमी विश्व के बड़े से बड़े आविष्कार की नकल करने की क्षमता जुटा लेता है तो उसकी असलियतों को भी जानने की कोशिश होनी चाहिए।' उसने एटीएम से लिए नोट कस कर जेब के भीतर पकड़े हुए थे।

हम लोग गली में पहुँचे तो वह युवक वैसे ही अपने यंत्रों में मशगूल था।

'लो पैसे ले आया हूँ।' मेरे मित्र ने उससे कहा।

'कौन-सा लाऊँ?'

'क्यों, तुम्हारे पास यहाँ नहीं?'

'बहुत-सी चीजें यहाँ रखने में खतरा है न?'

'खतरा! ...काय का खतरा?'

'अजी वो पुलिसवाले हैं न? आ धमकते हैं। कहते हैं नकली माल बेच रहे हो। हम कहते हैं भाई हम बेच रहे हैं तो बनानेवालों को पकड़ो न? साब वे मोटी रकम दे देते हैं और छूट जाते हैं। मिलीभगत इतनी तगड़ी है साब कि उतने ओरीजनल नहीं बिकते जितने डुप्लीकेट बिकते हैं। और यहाँ ही नहीं, बड़ी कोरियाई और दूसरी कंपनियाँ भी सस्ता माल खरीद कर अपने माल की जगह ये बेच कर मालामाल हो रही हैं।' अपना लंबा वाक्य बोल वह तुरंत उठा और गली में आगे की ओर भाग गया...। थोड़ी ही देर में वह दो डिब्बे ले कर आ गया। हमें हैरानी थी कि वह उसी गली की किसी दुकान से दूसरी गली में जाता था और अपना मनचाहा माल ले आता था।

'ये दो देखिए साब। जो लेटेस्ट चल रहे होंगे अमेरिका में उनकी नकल है।'

'हिंदुस्तानी ही है न?'

'एकदम खाँटी भगीरथ पैलेस की चीज है सर और डिब्बे पर नाम पढ़िए तो जापानी कंपनी का माल लगेगा। कुछ बरस पहले जापान टाप पर था, अब हमारा भगीरथ पैलेस नकल बनाने में माहिर हो गया। वहाँ आपको ऐसे-ऐसे सधे एक्सपर्ट मिलेंगे कि आप दाँत तले अँगुली दबा लेंगे।'

मेरे मित्र ने वह लिया और उससे सीधे पहले अपने-अपने उस सूत्र को अंकित किया जहाँ से सब सूचनाएँ मिल सकती थीं।

'आश्चर्य!' उसने चीख कर कहा, 'ठीक वैसा ही। अब मैं मजे में अपनी गोपनीय चीजें इसमें ट्रांसफर कर सकता हूँ।' वह कुछ ज्यादा ही खुश दीख रहा था - 'चलो तो अपना ओरिजनल यंत्र भी ले लें। डर है कहीं कोई सूचना लीक न हो जाय।'

हम पैसे चुका सीधे वहाँ से गफ्फार मार्केट की ओर चले। हम उस दुकान पर पहुँचे तो अभी वह युवक उसी यंत्र पर झुका हुआ था।

'आप ठीक टाइम पर आए!' उसने कहा, 'मैं करीब-करीब ठीक ही कर चुका हूँ।' बस इसका एक सर्किट कहीं बाहर से कनेक्ट है। उसके खुलने भर की देर है।'

'क्या तुम इसके रिकार्ड इस नए यंत्र में ट्रांसफर कर सकते हो?'

'हाँ - क्यों नहीं। पर जो चीज क्लोज होगी वह ऐसी ही रहेगी। जब तक बाहर का कोड सिग्नल्स की तमाम चीजों को नहीं खोलता।'

मेरे मित्र ने उसे नया मोबाइल दिया।

'यह तो बड़ा अच्छा है। पर भगीरथीयन है।' वह बोला।

'क्या मतलब?'

'अजी भगीरथ पैलेस का बना हुआ। कुछ दिन तो काम चला लेगा। बाकी का अल्लाह मालिक।' उसने एक छोटी तार से दोनों यंत्रों को जोड़ा और उनके तमाम संरक्षित रिकार्ड दूसरे में भरने लगा।

'बस वही क्लोज्ड सर्विसवाला मामला, यहाँ रिकार्ड नहीं होगा।'

'तो कहाँ होगा?'

'मैं सोचता था कि ओरिजिनल कंपनी को भेजना पड़ेगा। जरा अपना पासवर्ड तो बताना...'

'यह मुझे पकड़ा दो तो मैं पासवर्ड दर्ज कर लूँगा।'

उसने हैरानी में मेरे मित्र को देखा। वह थोड़ा चुप रहा। फिर उसने धीरे से नीचे पड़े एक डुप्लीकेट का बटन दबाया और कहा, 'आप न बताएँ उससे क्या फर्क पड़ता है। हमारा डुप्लीकेट हर रहस्य को बता देता है।' उसने अपने डुप्लीकेट मोबाइल को मेरे दोस्त के सामने किया, 'देखिए आपका बारह डिजिट का सीक्रेट पासवर्ड।'

मेरा मित्र हैरानी में कभी उसे देखता तो कभी मुझे। वह असमंजस में था और उसके चेहरे पर थोड़ा गुस्सा झलका, 'मैनुअल में तो लिखा था कि इसे कभी कोई कहीं डिटेक्ट नहीं कर सकता।'

'सर... मैनुअल मैंने देखा नहीं। हमारे यहाँ तो ऐसी प्रतिभाएँ हैं जो आपके टेलीफोन के पैरेरल अपना नंबर लगा कर आपकी बातें सुन सकते हैं और आपको पता भी नहीं चलेगा।'

'सत्यानाश।' उसने कहा, 'इसका मतलब है कि मेरा गोपनीय डाटा सार्वजनिक हो सकता है?'

'कौन-सी चीज गोपनीय रह गई है साहब। आप जो कुछ फोन पर बात करते हैं वह बिना आपको पता चले, बिना रिकार्ड सुनी जा सकती है। मेरे पास तो विचित्र-सी चीज है। इस इन्स्ट्रूमेंट से आप अपने किसी भी जानकार का मोबाइल जैम कर सकते हैं। इस नए युग में असंभव भी अब संभव है, सर...' वह बोला।

अपने मित्र को विचलित देख मैं कुछ उपाय सोचने लगा। मुझे महसूस हुआ कि मुझे इसमें कूद ही पड़ना चाहिए।

'अब इसका हिसाब करो भई।' यह बात दोनों को संबोधित थी।

'क्या हिसाब?' मेरा मित्र चीखने के अंदाज में बोला, 'जो चीज मैं यहीं देखना चाहता था वह यांत्रिक विवशता के कारण अमेरिका में ही खुल पाएगी और यह बच्चा कहता है सब कुछ यह जान सकता है।'

'नहीं, मैंने ऐसे नहीं कहा साहब... मैं तो बोल रहा था आप पासवर्ड मुझे न भी बताएँ तो भी मैं उसे जान सकता हूँ। इससे ज्यादा कुछ नहीं।'

'यही तो समझ में नहीं आ रहा है?'

'पर यह आसान चीज है।'

'कैसे।'

'आप उम्र में बड़े हैं। फिर भी बताता हूँ। आदमी कुछ खाता है तो उससे रक्त बनता है। यह सामान्य-सी चीज है। मशीनों में भी यही मामला है। उसमें हम जो फीड करेंगे उन्हीं के अनुरूप वह काम करेगी। है न?'

'परंतु कुछ चीजों को तो सिर्फ वही जान सकता है जो प्रयोगकर्ता यानी यूजर है?'

'साब थ्योरी में सब ठीक है। हम इन पुर्जों के भीतरी रहस्य जानते हैं। इनमें क्या है यह तो एक इंजीनियर जानता ही है - क्या छिपाया हुआ है कहाँ है, यह हम जैसे बेपढ़े लोग खोज लाते हैं।'

'अच्छा मेरा पुरानावाला क्या पूरी तरह ठीक हो जाएगा?'

'मैं यहीं ठीक कर लेता पर उसके भीतरी लाक के कुछ पुर्जे हैं जो यहाँ मिल नहीं रहे। बना तो दूँगा। पर फाउंड्री इतने बारीक चिप्स की खराद पर काम नहीं करती। इन्हें हाथ से बनाना पड़ेगा, कुछ वक्त लग जाएगा।' उसने कहा।

'जितना हो सके मेरे पुराने की डिटेल्स नए में ट्रांसफर कर दो।'

'यह तो मैं कह ही रहा था।'

'बाकी कब तक ठीक हो जाएगा?'

'आप पासवर्ड दे देंगे तो...'

'पर उसकी सीक्रेसी की क्या गारंटी?'

'सर, मुझसे बाहर नहीं जाएगी और आप जानते ही हैं मैं सिर्फ एक मैकेनिक के रूप में काम करता हूँ। मैं मिलियन बिलियन डालर्स की सिर्फ फीगर्स देख सकता हूँ।'

उसकी गहरी बातें सुन कर मुझे भी हैरानी हो रही थी।

'नहीं, इसमें इससे भी ज्यादा गोपनीय है। मैं नहीं चाहता कि तुम जानो।'

'आप ठीक कह रहे हैं, सर।' उसने अपनी आँखों से कुछ ऐसा भाव झलकाया, बच्चे हमसे टकरा कर क्या करोगे। और इसी बीच वह फक्क से हँस दिया। उसके हँसने की कोई वजह नहीं थी। वह हँसे ही जा रहा था। आसपास के लोग खड़े हो गए थे। जैसे पूछ रहे हों, 'क्या हो गया...'

सचमुच मेरे दोस्त ने पूछा, 'क्या मामला है?'

'बस्स साहब। इसमें एक लिंक वीडियो भी है जो कैमरे के साथ छिपा है।'

'अरे बाप रे... तूने उसका भी पता लगा लिया।' मेरे दोस्त ने लपक कर अपना यंत्र अपने हाथ में ले लिया।

'थोड़ा इसे ठीक कर लूँ... मैं तो काम में लगा था।'

'अब क्या ठीक करना है?'

'सर, इसके कई सर्किट जो गोपनीय क्षेत्र के हैं, एक दूसरे पर 'जंबल्ड अप' हैं। उन्हें ठीक करना है।'

'अब रहने ही दो।'

'आप लोग जल्दी आ गए न?'

'चलो अब बताओ पैसे!'

'आप जल्दी आ गए न? मैं पूरी तरह दुरुस्त कर ही चुका था। खैर पैसे जितने आपकी मर्जी हो। कुछ भी दे दें।'

'हमें देर हो रही है। कहीं पहुँचना भी है। अगर कोई कंप्लीकेशन हुई तो...'

'नहीं होगी।' उसने कह कर बात खत्म कर दिया फिर अपने दूसरे यंत्रों में व्यस्त हो गया।

हम लोग अनिर्णय में खड़े थे।

मेरे दोस्त ने जेब से पर्स निकाला, 'पैसे तो बताओ?'

'क्या मैंने पहले नहीं बताए थे?'

'नहीं।' मेरे दोस्त ने कहा।

'आप जो मुनासिब समझें।'

'अरे भाई बताओ भी।' मेरे दोस्त ने फिर दुहराया।

'दो हजार रुपए दे दें।'

'ज्यादा हैं?'

वह अपने काम में लगा रहा। उसने कोई उत्तर नहीं दिया।

'मुझे कुछ परेशानी होगी तो मैं आपको फोन कर लूँगा।' मेरे मित्र ने पैसे देते हुए कहा, 'अपना नंबर तो दे दो।'

'आप इस नंबर पर रमेश पूछ लीजिए... हम एक दर्जन रमेश हैं जो इसी काम में माहिर हैं। बस हम कहीं बाहर आ-जा नहीं सकते।'

'मतलब हमें यहीं आना पड़ेगा।'

'जी यही बात है। आना आपको ही पड़ेगा। हाँ कभी मैं नहीं मिला तो दूसरा मिल जाएगा। फोन भी हमारा एक ही नंबर का है।'

'एक ही नंबर का टेलीफोन?' मेरे दोस्त ने हैरानी जताई।

'जी हाँ। हम द्रौपदी के देश के हैं न? जहाँ एक बच्चे के पाँच बाप हो सकते हैं। पाँच जनों की एक पत्नी हो सकती है।' वह हँसने लगा, मेरी माँ कहती है 'मोये... कहीं सारे एक लड़की से शादी न कर लेना। महाभारत छिड़ जाएगा। एकदम महाभारत।'

'क्या कह रहे हो यार।' मेरा दोस्त विचलित हो गया, 'क्या मैं सचमुच हिंदुस्तान में हूँ?'

'सर... आपका यंत्र हम टेलीफोन पर ही ठीक कर देंगे। जो भी सुनेगा समझ कर वह तत्काल काम कर देगा।' इसी बीच उसका फोन बज उठा। वह शहनाई की तरह घंटी थी जो बाद में सबद-कीर्तन की तर्ज पर फैल गई थी और अनुगूँज के रूप में उसी का अहसास करा रही थी।

'मैं इसी पर फोन करूँगा।' मेरे दोस्त ने कहा, 'परंतु यहाँ से जाने से पहले यह जरूर पूछना चाहूँगा कि क्या नकल की इस दुनिया को सरकार लगाम नहीं लगाती।'

'क्यों नहीं सर?'

'तो फिर इतने खुले में कैसे करते हैं लोग?'

'सर सच कहूँ।'

'हाँ बोलो।'

'यह सब मिलीभगत है।' वह जोरों से हँसा और हँसता रहा।

अपना यंत्र ले कर हम लौटने को हुए। हम मैकेनिक को अलविदा कहने ही वाले थे कि उसने हमें रुकने के लिए इशारा किया।

'असल में सर जब मैं मिलीभगत कहता हूँ तो सच कहता हूँ, एकदम सच। साले बिचौलिए करोड़ों-लाखों डकार जाते हैं और पता भी नहीं चलता कि क्या हुआ। अब हमारी हालत देखिए, नई से नई चीज बनाते हैं, पर हमारी कोई पूछ ही नहीं। इन गलियारों में आप एक से एक आदमी देखेंगे जो बहुत ही दिमागवाले हैं। पर उन्हें कौन पूछता है?'

मेरे मित्र थोड़ा विचलित हो गए थे।

मैंने उन्हें उस स्थिति से मुक्त करने के लिए प्रस्ताव दिया, 'ऐसा करते हैं बाजार का एक चक्कर लगा लेते हैं। शायद कुछ लेने की इच्छा हो जाय।'

'ठीक है।' हम लोग अब चलने को ही थे कि वह युवक एकदम खड़ा हो गया। बोला, 'साहब, जाने से पहले मेरी एक प्रार्थना जरूर सुनें।'

'हाँ बताओ।'

'साब वादा करें कि आप मान जाएँगे।'

'माननेवाली बात होगी तो जरूर मानेंगे।'

'मैं नाइजीरिया के एक आदमी को यहाँ फिरते देखता हूँ, वह आपके जैसे यंत्रों की टोह में रहता है। बस ऐसे ही लोगों से बचे रहिए।'

'सो तो मैं हर पुख्ता गोपनीयता बरतता हूँ।'

'उतना ही काफी नहीं है।' उसने मेरे कान में कहा, 'अपने पासवर्ड में कुछ बौद्ध मंत्र डाल दें। किसी के बाप की हिम्मत न होगी छेड़ने की।'

'यह तो ठीक रहा।' मैं संदेह में था। वह मुझे क्या बता रहा है? पर क्यों, यह पूछता तो काफी समय लगता।

'मैं ठीक कह रहा हूँ, सर।' उसने फिर मुझे रोकने के ही अंदाज में बोलना शुरू किया, 'मैं यह सब इसलिए कह रहा हूँ सर कि जब तक आप सचेत नहीं हो जाते कुछ लोग आपको नुकसान पहुँचाने के फिराक में हैं।'

'ठीक है, मैं ऐसा ही कर लूँगा।' मैंने जल्दी के मारे कहा।

'तो फिर आपको बाद में फोन करूँगा।'

'ठीक है...' और हम आगे बढ़ आए।

'करोलबाग की एक विचित्र दुनिया है,' मेरे दोस्त ने कहा।

'हाँ, विचित्र ही है।' मैंने हामी भरी।

'यह व्यापारियों का स्वर्ग है।'

'निश्चय ही।' मैंने उत्तर दिया।

'परंतु आज अनुभव हुआ कि नई से नई चीज की नकल में भी यह सबसे आगे है।' मेरे मित्र ने टिप्पणी कर डाली।

मेरा खयाल है इस पर गंभीरता से सोचना होगा कि यह कैसे हो रहा है?

अब मेरे मित्र के पास दो यंत्र थे। और वे उतावले थे कि अपने डेरे पर जा कर कुछ देर अपना काम करें। मुझे भूख लग रही थी सो मैं उन्हें किसी अच्छी जगह ले जाना चाहता था।

'क्यों न कहीं बैठें?' मैंने प्रस्ताव दिया।

'नहीं भाई। मैं सीधे डेरे पर जाना चाहता हूँ।'

'इस वक्त और डेरे पर?'

'दरअसल, पीछे छूटे हुए काम पूरा करना चाहता हूँ।' उसने उतावली दिखाई।

'तो फिर सेंटर में कुछ खा लेंगे।' मैंने प्रस्ताव दिया।

'परंतु मित्रवर, मुझे अब इन दो यंत्रों से अपने काम पूरे करने हैं। मैं मूर्खता में अपने लौटने की टिकटें भी बनवा चुका हूँ। अगर इन यंत्रों से काम चल जाता है तो मैं यहाँ भी रुक सकता हूँ।'

'सेंटर में पर्याप्त एकांत है।' मैंने सुझाया

'परंतु...'

'अब ज्यादा क्या सोचना?'

'कुछ कागज डेरे पर हैं।'

'जितनी देर कागजों के बिना काम चल सकता है उतनी ही देर, बस उतनी ही देर चलाओ। फिर वापिस हो लेंगे!' तभी यंत्र में हलचल हुई।

मेरे मित्र ने जेब से निकाल कर नया यंत्र बाहर किया। उसका चेहरा खिल गया था।

'यह नए यंत्र में मेरी सूचनाएँ आने लगी हैं, यह बहुत अच्छा है।' वह खुश हुआ। हम किसी सवारी की तलाश में आगे निकल आए।

'वो देखो तो एक टैक्सी खड़ी है।' मेरे मित्र ने बताया।

जब तक हम वहाँ पहुँचे टैक्सी जा चुकी थी।

'चलो थोड़ी देर इंतजार कर लेते हैं।' मैंने यह सुझाव इसलिए दिया कि उसे अपने यंत्र से खेलने का मौका मिल जाय।

'मैं जिस चीज से बेचैन था अब उससे मुक्त हूँ। क्योंकि सभी सूचनाएँ ठीक-ठीक आ रही हैं। विचित्र हैं ये लड़के, उसने सारी चीजें इसमें ट्रांसफर कर दी हैं।' मेरा मित्र अब खूब खुश दीख रहा था। पहले जैसी मुर्दनी, संदेह और अविश्वास उसके चेहरे से गायब थे। वह हिंदुस्तानी कारीगरों की कारीगरी से विस्मित था। एकदम विस्मित।

'बस मुझे डेरे पर पहुँच कर इस सूचना का मिलान करना है। है यह आसान काम पर गणितीय समीकरण के कारण इसे एकदम सही होना चाहिए।'

तभी कहीं से एक टैक्सी आती दिखाई दी। हमारे हाथ देने पर वह रुकी, 'सर, सिर्फ साउथ चलूँगा।' ड्राइवर सरदार था, सीधे बोला।

'ओ चलो नी साउथ ही चलते हैं।' मेरे मित्र ने दरवाजा खोला। पहले मुझे सवार कराया फिर खुद बैठा, 'सर कित्थे?' सरदार ने गंतव्य पूछा।

हमने एक साथ कहा, 'लोधी गार्डन के पास।'

'पैसे आप ही सोच कर देना साहब।' वह बोला और तेज रफ्तार गाड़ी चलाने लगा। वह कुछ-कुछ हँसमुख था।

'जरा धीरे चलो भाई।' मैंने टोका।

'सड़क साफ है न जी...।' वह अपनी रफ्तार से चलता रहा, 'ये साले अमेरिकी इस इलाके में भी अपनी नाक घुसा रहे हैं।' वह अपनी रौ में बोलने लगा, 'लो जी अपना चूल्हे तक के बीच...'

'क्या कह रहे हो भाई?' मैंने पूछा।

'अजी ये अमेरिकी हैं न? अब देखो बगल में पाकिस्तान में घुसे हुए हैं।'

'अरे भाई, तुम्हारी ये सवारी भी अमेरिकी है,' मैंने टैक्सी ड्राइवर से अपने मित्र का परिचय कराते हुए कहा।

'ये तो हिंदुस्तानी लग रहे हैं और हिंदुस्तानी बोल रहे हैं।'

'अब वहाँ जो हिंदुस्तानी रहते हैं वे अपनी जुबान ही बोलेंगे न?'

'वोह! तो रब्ब की मेहरबानी है। साब, मुझे भी वहीं ले चलो। मैंने सुना है अमेरिका में सड़कों पर डालर झड़ते रहते हैं... मैं भी अमेरिका जाऊँगा... उसने स्टेयरिंग व्हील पर ताल देना आरंभ कर दिया... मैं भी जाऊँगा... मैं भी जाऊँगा...'

मैं भी जाऊँगा - गंगा प्रसाद विमल